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बंगाल के चाय बागान मजदूर किसे देंगे वोट?

तस्वीर: इंडियन एक्सप्रेस/योगेश पाटिल

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पश्चिम बंगाल के मशहूर चाय बागानों में, हर दिन सुबह से शाम तक हज़ारों मज़दूर चाय की पत्तियाँ तोड़ते हैं। लेकिन इन खूबसूरत हरी पहाड़ियों के पीछे एक दर्दनाक सच्चाई छिपी है। वे कड़ी मेहनत करते हैं, फिर भी उन्हें अपने बुनियादी अधिकार पाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है:
•  न्यूनतम मज़दूरी बहुत कम है
•  तनख्वाह समय पर नहीं मिलती
•  प्रोविडेंट फंड (PF) का पैसा उनकी तनख्वाह से काट लिया जाता है, लेकिन अक्सर जमा नहीं किया जाता
•  कई परिवारों को महीनों तक बकाया पैसा नहीं मिलता, जिससे उन्हें गंभीर आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है
इस ग्राउंड रिपोर्ट में, हमने चाय बागानों का दौरा किया और सीधे मज़दूरों और उनके परिवारों से बात की। उनकी असली कहानियाँ सुनिए — कि कैसे वे हर महीने अपने बच्चों को खाना खिलाने, दवाइयों का खर्च उठाने और सम्मान के साथ गुज़ारा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। देर से पेमेंट मिलने से लेकर PF का पैसा जमा न होने तक, यह वीडियो उस ज़मीनी हकीकत को दिखाता है जो मुख्यधारा के मीडिया में शायद ही कभी दिखाई जाती है। अगर आप मज़दूरों के अधिकारों, उनके संघर्षों और भारत के चाय उद्योग के पीछे की सच्चाई की परवाह करते हैं, तो इस वीडियो को आखिर तक ज़रूर देखें।

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