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'2046 के बाद सुनवाई होगी', 90 साल की बुजुर्ग का केस 20 साल के लिए क्यों टल गया?

मानहानि की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है कि इसे ईगो की लड़ाई बना लिया गया है इसलिए इस पर 2046 के बाद सुनवाई होगी।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: ChatGPT

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने मानहानि के एक मामले की सुनवाई अगले 20 साल के लिए टाल दी है। हाई कोर्ट ने कहा कि यह मामला माफी मांग लेने से भी हल हो सकता है लेकिन याचिकाकर्ता ने इसे ईगो की लड़ाई बना लिया है। होई कोर्ट ने जिस शख्स के केस को 20 साल के लिए टाला है उनकी उम्र अभी 90 साल है। इसका मतलब है कि अगर इस केस पर सुनवाई होती है तो 2046 के बाद होगी और उनकी उम्र 110 साल हो चुकी होगी। अब याचिकाकर्ता ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया है।

 

मंगलवार को इस मामले पर सुनवाई कर रहे बॉम्बे हाई कोर्ट के जज  जितेंद्र जैन ने एक लाइन में निर्देश दिया कि इस मामले को कोई प्राथमिकता न दी जाए और कम से कम 2046 के बाद ही इस पर सुनवाई हो। यह मामला 90 साल की मशहूर गुजराती लेखिका तारिणीबेन देसाई का है जो गुजरात और महाराष्ट्र में साहित्य अकादमी जैसे पुरस्कारों से सम्मानित भी हो चुकी हैं।

 

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क्या है मामला?

 

यह याचिका तारिणी बेन देसाई और उनकी 57 साल की बेटी ध्वनि देसाई की ओर से दायर किया गया है।  ध्वनि पेशे से एक एनिमेशन फिल्म निर्माता हैं। मां-बेटी की इस जोड़ी ने यह मुकदमा श्याम को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी की मैनेजिंग कमेटी के पांच सदस्यों के खिलाफ किया है। ये लोग जून 2016 तक कमेटी के सदस्य थे। दो और सदस्यों के खिलाफ भी मुकदमा किया गया है। इसमें से एक सदस्य 2006 से 2007 तक तो दूसरे सदस्य 2009 से 2010 तक कमेटी के सदस्य थे।

 

रिपोर्ट के मुताबिक, इस हाउसिंग सोसायटी में कुल पांच बिल्डिंग जिनमें तारिणी बेन देसाई और उनके परिवार समेत कुल 292 सदस्य रहते हैं। अब मां-बेटी की इस जोड़ी ने मानहानि की मुकदमा दर्ज कराते हुए 20 करोड़ का हर्जाना मांग है। इनका आरोप है कि सोसायटी के सदस्यों ने गलत तरीके से उन्हें 'डिफॉल्टर' घोषित किया जिसके चलते उनका अपमान किया। उनका कहना है कि सोसायटी में रिपेयरिंग के कामकाज में हो रहे खर्च को लेकर सवाल उठाने की वजह से 8 साल तक उन्हें परेशान और अपमानित किया गया, तब जाकर उन्होंने 2017 में केस दायर किया गया।

 

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दोनों का यह भी कहना है कि मेंटेनेंटस के पैसे ना देने की वजह से सालाना जनरल बॉडी मीटिंग में उन दोनों को डिफॉल्टर कहा गया। हालांकि, दोनों का यह भी कहना है कि उन्होंने अपना बिल जमा किया था। उन्होंने बताया है कि साल 2009 में नानक निवास ब्लॉक 3 बिल्डिंग के रिपेयर के काम की लागत 50-60 लाख रुपये से बढ़ाकर 1 करोड़ कर दी गई थी। उनके मुताबिक, जब दोनों ने शिकायत की तब सोसायटी के रजिस्ट्रार ने इसकी जांच भी की और उसमें भी गड़बड़ियां भी पाई गईं।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

 

इस मामले की सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस जितेंद्र जैन ने कहा, 'पहले भी इसी अदालत ने एक बार कहा है कि बिना शर्त माफी मांग लिए जाने से यह मामला हल हो सकता है। हालांकि, 90 साल की हो चुकीं याचिकाकर्ता (तारिणीबेन देसाई) फिर भी मानहानि का मुकदमा चलाना चाहती हैं। मैं इस मामले में सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि इस पर कम से कम अगले 20 साल तक सुनवाई न हो। यह सिर्फ दो पक्षों के ईगो की लड़ाई है और इससे सिस्टम पर बोझ बढ़ता है और बेहद जरूरी मामलों की सुनवाई में देरी होती है।'

 

अब इस मामले पर तारिणीबेन देसाई के वकील स्वराज जाधव का कहना है कि इस फैसले से उनके क्लाइंट हताश हैं। स्वराज जाधव का कहना है कि इस फैसले को जरूर ही उच्च अदालत में चुनौती दी जाएगी।

 

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