देश के बड़े शहरों जैसे मुंबई, बेंगलुरु और गुरुग्राम के रेस्टोरेंट में इन दिनों चूल्हे ठंडे पड़ने लगे हैं। सरकार घरेलू गैस को फिलहाल प्राथमिकता दे रही है जिसकी वजह से कमर्शियल सिलेंडरों की सप्लाई लगभग ठप हो गई है। हालात इतने खराब हैं कि बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में कई आइटम जैसे डोसा या चाइनीज खाने को मेन्यू से हटाया जा रहा है या कम बनाया जा रहा है।
होटल मालिकों का कहना है कि जहां उन्हें रोज़ाना 8 से 10 सिलेंडरों की जरूरत होती है, वहां अब एक भी नहीं मिल पा रहा। डिस्ट्रीब्यूटर्स ने हाथ खड़े कर दिए हैं और ब्लैक मार्केट में सिलेंडर की कीमतें आसमान छू रही हैं। 1,940 रुपये का सिलेंडर 3,000 रुपये तक में बिक रहा है, फिर भी आसानी से उपलब्ध नहीं है।
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कोयला और इंडक्शन का सहारा
गैस की कमी को देखते हुए कई बड़े रेस्टोरेंट्स ने अपना तरीका बदल लिया है। रेस्टोरेंट्स में कोयले के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है। तंदूरी आइटम और ऐसे खाने जो कोयले पर बन सकते हैं, उन्हें बढ़ावा दिया जा रहा है।
पैन-एशियन और ओरिएंटल खाने के लिए बिजली के चूल्हों का इस्तेमाल हो रहा है, हालांकि शेफ का मानना है कि इससे वो असली स्वाद और तेज आंच नहीं मिल पा रही। साथ ही जिन डिशेज को पकाने में ज्यादा समय और गैस लगती है, उन्हें फिलहाल के लिए बंद कर दिया गया है।
प्रमुख शहरों का हाल
बेंगलुरु में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर तुरंत दखल देने की मांग की है। यहां के विद्यार्थी भवन जैसे पुराने होटलों ने तवों की संख्या कम कर दी है ताकि गैस बचाई जा सके।
मुंबई और गोवा जैसे शहरों में होटल एसोसिएशन का कहना है कि अगर अगले कुछ दिनों में सप्लाई नहीं सुधरी, तो सैकड़ों छोटे-बड़े रेस्टोरेंट पूरी तरह बंद हो जाएंगे।
हिमाचल प्रदेश में गर्मियों का टूरिस्ट सीजन शुरू होने वाला है, ऐसे में होटल मालिक डरे हुए हैं कि बिना गैस के वे सैलानियों को खाना कैसे खिलाएंगे।
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क्या कहती है सरकार और तेल कंपनियां?
हालांकि जमीनी हालात चिंताजनक हैं लेकिन केंद्र सरकार और तेल कंपनियों का दावा है कि गैस का स्टॉक पर्याप्त है और घबराने की जरूरत नहीं है। सरकार ने LPG उत्पादन को 10 फीसदी तक बढ़ाने के निर्देश भी दिए हैं। नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) ने भी अपने सदस्यों को सलाह दी है कि वे कम गैस खर्च करने वाली डिशेज पर ध्यान दें और किचन स्टाफ को गैस बचाने की ट्रेनिंग दें।