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'शादीशुदा आदमी भी लिव-इन में रह सकता है', कोर्ट ने अपने ही फैसले को उलट दिया?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशपशिप को लेकर एक फैसला सुनाया, जिसमें उसमें खुद के द्वारा दिए गए पहले के फैसले को ही पलट दिया।

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प्रतीकात्मक तस्वीर । Photo Credit: AI Generated

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एक फैसले में कहा था कि एक शादीशुदा आदमी भी लिव-इन रिलेशनशिप में रह सकता है। यह किसी भी तरह का अपराध नहीं है। हालांकि, यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा दिए गए पहले के ही इसके एक फैसले के उलट है।

 

कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई शादीशुदा आदमी किसी वयस्क महिला के साथ सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप (साथ रहना) में रह रहा है, तो यह कोई कानूनी अपराध नहीं है। अदालत ने इस बात पर जो दिया था कि सामाजिक नैतिकता (मोरलिटी) को कानून से अलग रखना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर कानून में कोई अपराध नहीं बनता, तो समाज की राय कोर्ट के फैसले को प्रभावित नहीं कर सकती।


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क्या कहा कोर्ट ने?

यह टिप्पणी 25 मार्च 2026 को दो जजों की बेंच (जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना) ने की। बेंच एक लिव-इन कपल की याचिका सुन रही थी। इस कपल को महिला के परिवार से जान का खतरा था। कपल ने कोर्ट से सुरक्षा मांगी थी। कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि वह इस कपल की सुरक्षा करे और परिवार को कोई नुकसान पहुंचाने से रोके।

 

कोर्ट ने कहा, 'कोई शादीशुदा आदमी अगर किसी वयस्क के साथ सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है तो उस पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। नैतिकता और कानून को अलग-अलग रखना चाहिए। अगर कानून के तहत कोई अपराध नहीं है, तो सामाजिक राय या नैतिकता कोर्ट को नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने से नहीं रोक सकती।'

पुराना फैसला उलटा?

अब कोर्ट का यह नया फैसला पुराने फैसलों से अलग नजर आ रहा है। 20 मार्च 2026 को पहले दिए गए फैसले के मुताबिक एक सिंगल जज (जस्टिस विवेक कुमार सिंह) की बेंच ने एक लिव-इन कपल को सुरक्षा देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि अगर कोई व्यक्ति पहले से शादीशुदा है और उसका जीवनसाथी जिंदा है, तो बिना तलाक लिए किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहना कानूनी रूप से सही नहीं है। पहले कानूनी तलाक लेना जरूरी है।

 

वहीं दिसंबर 2025 में भी कोर्ट ने इसी तरह की टिप्पणी की थी। उस समय भी कोर्ट ने कहा था कि शादीशुदा व्यक्ति बिना तलाक के किसी और के साथ लिव-इन में नहीं रह सकता। कोर्ट ने तब कहा था कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता (पर्सनल लिबर्टी) पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं है। यह दूसरे जीवनसाथी के कानूनी अधिकारों पर असर नहीं डाल सकती।

मामला क्या था?

इस नए मामले में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर के एक लिव-इन कपल ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दोनों वयस्क हैं और साथ रह रहे हैं। महिला के परिवार ने शिकायत की थी कि आदमी पहले से शादीशुदा है और उनकी जान को खतरा महसूस हो रहा था। कोर्ट ने पुलिस को सुरक्षा का आदेश दिया।

 

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कोर्ट ने जोर देकर कहा कि वयस्कों की सहमति से साथ रहना कानून के खिलाफ नहीं है, भले ही पुरुष शादीशुदा हो लेकिन इससे शादीशुदा जीवनसाथी के नागरिक अधिकार (जैसे साथ रहने का अधिकार) पर असर पड़ सकता है जो कि अलग मुद्दा है।


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