इस साल मई महीने में कई लोग पूर्णिमा का पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाएंगे। हिंदू धर्म में वैशाख पूर्णिमा बेहद खास पर्व है। हर महीने एक बार पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। उसी तरह मई महीने में वैशाख पूर्णिमा मनाई जाएगी। इस दिन चंद्रमा और भगवान विष्णु की पूजा करने का विशेष महत्व है। जहां एक तरफ सुबह भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है, वहीं दूसरी तरफ रात को चंद्रमा की पूजा की जाती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, वैशाख पूर्णिमा के दिन किए गए शुभ कार्यों का फल कई गुना बढ़ जाता है। इस वजह से कई लोग इस दिन गरीबों को रुपये, कपड़े या अनाज दान करते हैं।
मई में वैशाख पूर्णिमा पड़ने वाली है क्योंकि इस साल वैशाख माह 1 मई को समाप्त हो रहा है। वैशाख पूर्णिमा के दिन व्रत रखने की परंपरा है क्योंकि धार्मिक मान्यता के मुताबिक व्रत रखने से व्यक्ति के दुख, कष्ट और पाप कम होते हैं। कई लोगों के मन में वैशाख पूर्णिमा की तारीख को कन्फ्यूजन लेकर है तो आइए जानते हैं सही तारिख क्या है?
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कब है वैशाख पूर्णिमा?
हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल वैशाख पूर्णिमा 30 अप्रैल की रात 9 बजकर 12 मिनट पर शुरू होगी और 1 मई की रात 10 बजकर 52 मिनट पर समाप्त होगी। हिंदू धर्म में व्रत उदय तिथि के आधार पर रखा जाता है इसलिए वैशाख पूर्णिमा 1 मई को मनाई जाएगी। इसी दिन व्रत रखना शुभ होगा।
स्नान और पूजा का शुभ समय
वैशाख पूर्णिमा के दिन सुबह 5:40 बजे से लेकर 9:00 बजे तक स्नान करना शुभ रहेगा। इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। स्नान के बाद भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए।
वैशाख पूर्णिमा के नियम
गंगा स्नान - इस दिन गंगा नदी में स्नान करना चाहिए। यदि संभव न हो तो घर में पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
दान करना - इस दिन गरीब और जरूरतमंद लोगों को अपनी क्षमता अनुसार दान देना चाहिए। छाता, पंखा, चीनी और कपड़ों का दान विशेष फलदायी माना जाता है।
व्रत रखें - इस दिन निर्जला व्रत रखना श्रेष्ठ माना जाता है। जो लोग निर्जला व्रत नहीं रख सकते, वे फलाहार व्रत रख सकते हैं। इस दिन तामसिक भोजन (मांस, मछली, लहसुन, प्याज) से परहेज करना चाहिए।
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पूजा-अर्चना -सुबह भगवान विष्णु की पूजा करें और रात में चंद्रमा की पूजा करें।
दीप दान - इस दिन नदी या घाट के किनारे दीपक जलाना शुभ होता है। शाम को घर में भी दीपक जलाना चाहिए।
वैशाख पूर्णिमा की कथा
एक समय की बात है, एक नगर में धनेश्वर नाम के ब्राह्मण अपनी पत्नी सुशीला के साथ रहते थे। उनके पास धन की कोई कमी नहीं थी फिर भी वे दुखी रहते थे क्योंकि उनकी कोई संतान नहीं थी। उसी नगर में एक साधु प्रतिदिन भिक्षा मांगने आता था लेकिन वह कभी धनेश्वर के घर भिक्षा लेने नहीं जाता था। यह देखकर सुशीला दुखी हो गई। एक दिन उसने साधु से पूछा कि आप हमारे घर भिक्षा क्यों नहीं लेते? साधु ने कहा कितुम्हारी संतान नहीं है इसलिए मैं तुमसे भिक्षा लेकर पाप का भागी नहीं बनना चाहता। यह सुनकर सुशीला बहुत दुखी हुई और संतान प्राप्ति का उपाय पूछा।
साधु ने उन्हें सोलह दिन तक मां चंडी की उपासना करने की सलाह दी। दंपति ने वैसा ही किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां चंडी प्रकट हुईं और उन्हें पूर्णिमा व्रत रखने का निर्देश दिया।दंपति ने पूर्णिमा का व्रत रखा और कुछ समय बाद उन्हें संतान की प्राप्ति हुई।
डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि नहीं की जाती है।