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मार्गशीर्ष पूर्णिमा: साल की अंतिम पूर्णिमा कब है, महत्व क्या है?

मार्गशीर्ष पूर्णिमा, वर्ष की आखिरी और पवित्र पूर्णिमा मानी जाती है, जो भगवान विष्णु, चंद्र देव और देवी लक्ष्मी की पूजा के लिए महत्वपूर्ण है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit- Social Media

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मार्गशीर्ष पूर्णिमा हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और विशेष फलदायी मानी जाती है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वर्ष की अंतिम पूर्णिमा होती है। यह पूर्णिमा हिंदू वर्ष के अंतिम महीनों में से एक (अगहन/मार्गशीर्ष) में पड़ती है, जिसके तुरंत बाद पौष मास की शुरुआत हो जाती है। यह तिथि भगवान विष्णु, चंद्र देव और देवी लक्ष्मी की पूजा के लिए समर्पित मानी जाती है। इस वर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा तिथि 4 दिसंबर को सुबह 8 बजकर 37 मिनट से शुरू होकर 5 दिसंबर को सुबह 4 बजकर 43 मिनट तक रहेगी।


पूर्णिमा तिथि का उदयकाल 4 दिसंबर को है इसलिए स्नान, दान और व्रत इसी दिन किया जाएगा। चलिए जानते हैं इस व्रत की महत्ता और नियम--

 

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मार्गशीर्ष पूर्णिमा क्यों है महत्वपूर्ण?

मार्गशीर्ष पूर्णिमा का धार्मिक महत्व कई कारणों से असाधारण है:

 

1. श्री कृष्ण का स्वरूप


मार्गशीर्ष (अगहन) माह का महत्व स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने भगवद् गीता में बताया है। उन्होंने कहा है, 'मासानां मार्गशीर्षोहम्' मतलब 'महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूं।' यह कथन इस महीने और इस दिन को अत्यधिक पवित्र बनाता है, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु (कृष्ण) की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

 

2. सतयुग का आरंभ


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मार्गशीर्ष माह से ही सतयुग (धर्म का पहला युग) का आरंभ हुआ था। इसलिए इस माह की पूर्णिमा को किए गए धार्मिक कार्य और दान-पुण्य का फल कई गुना अधिक मिलता है।

 

3. स्नान-दान का महत्व


इस दिन पवित्र नदी, सरोवर या कुंड में स्नान करने का विशेष महत्व है। माना जाता है कि मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर स्नान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और आत्मा को शांति मिलती है। हरिद्वार, वाराणसी, मथुरा और प्रयागराज जैसे स्थानों पर श्रद्धालु इस दिन महास्नान करते हैं। इस दिन कंबल, तिल, गुड़, घी और अनाज का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

 

4. देवी लक्ष्मी और चंद्रमा की पूजा


पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सोलहों कलाओं से परिपूर्ण होता है। इस दिन चंद्र देव को अर्घ्य देने और उनकी पूजा करने से कुंडली में चंद्र दोष समाप्त होता है और मानसिक शांति मिलती है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा को देवी लक्ष्मी की पूजा के लिए भी अत्यंत शुभ माना जाता है। शाम के समय प्रदोष काल में माता लक्ष्मी का पूजन करने से घर में सुख, समृद्धि और वैभव का वास होता है।

 

5. भगवान दत्तात्रेय और अन्नपूर्णा जयंती


मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन ही भगवान दत्तात्रेय (जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का संयुक्त अवतार माना जाता है) और माता अन्नपूर्णा (देवी पार्वती का स्वरूप) की जयंती भी मनाई जाती है, जिससे इस तिथि का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

 

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मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर क्या करें?

  • सूर्योदय से पहले उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान करें या घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
  • स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु, कृष्ण और देवी लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें।
  • इस दिन भगवान सत्यनारायण की कथा सुनना या करवाना विशेष फलदायी माना जाता है।
  • भगवान विष्णु को तुलसी दल (यदि एकादशी न हो तो) और खीर का भोग अर्पित करें।
  • शाम के समय चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को दूध और जल से अर्घ्य दें।
  • अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को वस्त्र, भोजन या धन का दान करें।

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