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PM मोदी ने किया भैरवैक्य मंदिर का उद्घाटन, किस देवता या संत की होगी पूजा?

कर्नाटक के मांड्या जिले में बुधवार को भैरवैक्य मंदिर का उद्घाटन किया किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए।

Bhairavakya Temple

भैरवैक्य मंदिर, Photo Credit- ANI

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कर्नाटक का मांड्या जिला इस समय सुर्खियां बटोर रहा है क्योंकि आज यहां भैरवैक्य मंदिर का उद्घाटन किया गया। इस मंदिर का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। इसे लेकर कई लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि इस मंदिर में किस भगवान या संत की उपासना की जाएगी।

 

भैरवैक्य मंदिर में किसी भगवान की पूजा-अर्चना नहीं की जाएगी बल्कि एक महान संत बालगंगाधरनाथ का स्मरण किया जाएगा। बालगंगाधरनाथ ने अपने जीवन में कर्नाटक के कई लोगों के हितों के लिए काम किया था क्योंकि उनका मानना था कि धर्म सिर्फ पूजा-पाठ नहीं है बल्कि सच्चा धर्म लोगों की मदद करना है यानी कर्म ही धर्म है। अब सवाल उठता है कि बालगंगाधरनाथ कौन थे, जिनके जीवन और विरासत को श्रद्धांजलि देने के रूप में यह मंदिर स्थापित किया गया है।

 

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बालगंगाधरनाथ कौन थे?

बालगंगाधरनाथ महासंस्थान मठ के 71वें अध्यक्ष थे, जिनकी अटूट साधना और आध्यात्मिक विचारों ने उन्हें एक अलग पहचान दी। बालगंगाधरनाथ ने महासंस्थान मठ में उन्होंने अपने दयालु विचारों की वजह से कई लोगों की मदद की थी। मठ से जुड़ने के बाद उन्होंने नाथ पंथ की परंपरा के मुताबिक दीक्षा ली थी, जिसके बाद वह नाथ परंपरा के स्वामी रामानंद के आध्यात्मिक विचारों को आगे की पीढ़ियों तक पहुंचाते रहे।

 

बालगंगाधरनाथ को मिला था पद्म भूषण पुरस्कार

बालगंगाधरनाथ को 2010 में देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था क्योंकि उन्होंने महासंस्थान मठ के अध्यक्ष के रूप में समाज के लिए कई विकासात्मक कार्य किए थे। उन्होंने मठ में कई गरीब बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराई और मठ के आसपास के गांवों में गरीब लोगों को बुनियादी सुविधाएं दिलाईं। इसके अलावा उन्होंने गांवों में जातिवादी भेदभाव को खत्म करने और समाज में एकता को बढ़ावा दिया।

 

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साल 2013 में बालगंगाधरनाथ का किडनी फेलियर की वजह से निधन हो गया था। उस वक्त लाखों भक्तों की आंखें नम थीं लेकिन उनके समाजहित के कार्यों की वजह से वह आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। इसी वजह से माना जा रहा है कि भैरवैक्य मंदिर केवल श्रद्धा का केंद्र ही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी होगा।

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