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हेनरी कुत्ते के लिए हाई कोर्ट पहुंचीं महुआ मोइत्रा, एक्स पार्टनर से है कनेक्शन

तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सीनियर लीडर और सांसद महुआ मोइत्रा और उनके एक्स पार्टनर और वकील जय अनंत देहाद्रई के बीच एक पालतू कुत्ते के हिरासत की लड़ाई अब दिल्ली हाई कोर्ट पहुंच गई है।

TMC MP Mahua Moitra approach High Court for pet Henry case related to ex partner

महुआ मोइत्रा अपने पेट हेनरी के साथ। (Photo Credit: MahuaMoitra/X)

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तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा ने अपने पालतू रॉटविलर कुत्ते 'हेनरी' की कस्टडी के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने पिछले साल 10 नवंबर के साकेत कोर्ट के उस ऑर्डर को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें हर महीने 10 दिनों के लिए कुत्ते की कस्टडी देने से मना कर दिया गया था। अब इस केस की सुनवाई 29 अप्रैल को होगी।

 

गुरुवार यानी 19 फरवरी को सुनवाई के दौरान जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने महुआ मोइत्रा के पुराने साथी और वकील जय अनंत देहाद्रई को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने सुनवाई की अगली तारीख तय कर दी है।

 

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क्या है मोइत्रा की दलील और एक्स पार्टनर का पक्ष?

महुआ मोइत्रा ने अपनी याचिका में कहा है कि निचली अदालत का फैसला तथ्यों और कानून दोनों के लिहाज से सही नहीं है। उनका कहना है कि हेनरी अधिकतर समय उनके साथ ही रहता था। केवल तब वह उनके एक्स पार्टनर के पास रहता था, जब वह संसदीय कार्य या अपने क्षेत्र के दौरे के कारण दिल्ली से बाहर जाती थीं। ऐसे में कुत्ते पर उनका भी बराबर अधिकार बनता है और उन्हें नियमित कस्टडी मिलनी चाहिए।

 

दूसरी ओर, जय अनंत देहाद्राई खुद अदालत में पेश हुए और उन्होंने मांग की है कि याचिका को शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर दिया जाए। उनका दावा है कि कुत्ते को उन्होंने 2021 में करीब 75 हजार रुपये में खरीदा था और जब वह मात्र 40 दिन का था, तभी से उसकी देखभाल कर रहे हैं।

 

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क्या है पूरा विवाद?

खबर है कि महुआ मोइत्रा और जय अनंत देहाद्राई पहले निजी रिश्ते में थे और हेनरी की देखभाल करते थे। बाद में उनका रिश्ता बिगड़ गया और दोनों के बीच कानूनी झगड़ा हुआ। दोनों पार्टियों ने एक-दूसरे पर बिना इजाजत के कुत्ते को रखने या ले जाने का आरोप लगाया।

 

यह विवाद पहले से साकेत कोर्ट में लंबित है। ट्रायल कोर्ट ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया था कि वे इस मामले का सार्वजनिक प्रचार न करें। इस आदेश को देहाद्राई ने चुनौती देते हुए कहा था कि इससे वे केस के अस्तित्व तक के बारे में खुलकर बात नहीं कर पा रहे हैं।

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