ध्वनि प्रदूषण अब पक्षियों के जीवन के लिए काल बनता जा रहा है। ध्वनि प्रदूषण से बचने के लिए कई बार ये पक्षी पलायन करते हैं, ताकि अपने जीवन की रक्षा कर सकें। शोर की वजह से पक्षियों की दूर-दूर तक सुनने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसका सबसे बड़ा असर यह हुआ है कि कई प्रजातियां दुनिया से लुप्त हो गई हैं।
प्रकृति और मानव के बीच गहरा संबंध है। इस प्रकृति में कई पक्षी रहते हैं, जो इंसानों की तरह ही जीवित प्राणी हैं, हालांकि वे इंसान नहीं हैं। दुनिया में जहां एक तरफ शहरीकरण बढ़ता जा रहा है, वहीं मानव प्रकृति का दुश्मन बनता जा रहा है। मानव अपने लालच की वजह से जंगल काटकर घर बना रहा है, जिससे कई पक्षियों के घर उजड़ गए हैं। अब इन्हीं पक्षियों को जंगलों के हरे-भरे और शांत इलाकों को छोड़कर शहरों के भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में बसना पड़ रहा है। शहरों में रहना पक्षियों के जीवन का काल बनता जा रहा है, क्योंकि शहरों के शोर की वजह से उनकी सुनने की क्षमता कम हो रही है, जिससे वे अपना जीवन ठीक से जीने में असमर्थ हो रहे हैं।
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शोर का पक्षियों पर क्या असर पड़ता है?
फीडरवॉच नाम के एक वैज्ञानिक ने उत्तरी अमेरिका में कई पक्षियों का अध्ययन किया। इसमें 140 प्रकार के पक्षियों के लाखों रिकॉर्ड देखे गए। इन रिकॉर्ड्स का नतीजा यह निकला कि ज्यादातर पक्षी शोर वाली जगहों से दूर रहना पसंद करते हैं। गोल्डफिंच और गौरैया जैसे आम पक्षी भी शोर वाले इलाकों में नहीं रुकते। वहीं एक दूसरे शोध में देखा गया कि शोर की वजह से पक्षियों के घोंसलों पर नकारात्मक असर पड़ता है। शोर के कारण पक्षियों को घोंसला बनाने में अधिक समय लगता है।
ध्वनि प्रदूषण का पक्षियों पर असर
ध्वनि प्रदूषण की वजह से कम आवाज में गाने वाले पक्षियों की आवाज शोर में दब जाती है, इसलिए उन्हें साथी ढूंढने में परेशानी होती है। जो पक्षी तेज आवाज में गाते हैं, वे शोर से थोड़े कम प्रभावित होते हैं। इसके अलावा, जंगल में रहने वाले पक्षी खुले इलाकों में रहने वाले पक्षियों की तुलना में शोर से ज्यादा परेशान होते हैं। कम आवाज वाले पक्षी कभी-कभी अपने साथी नहीं चुन पाते, क्योंकि एक पक्षी अपनी सुरीली ध्वनि से दूसरे पक्षी को आकर्षित करता है, लेकिन धीमी आवाज के कारण अन्य पक्षी उनकी आवाज नहीं सुन पाते। इसका नतीजा यह निकलता है कि उस पक्षी का पूरा जीवन बिना साथी के ही बीत जाता है।
इसके अलावा जर्मनी में जेब्रा फिंच पक्षियों पर अध्ययन हुआ। इसमें पाया गया कि जिन जगहों पर ट्रैफिक का ज़्यादा शोर था, वहां पैदा हुए चूजे आकार में छोटे थे, जबकि शांत जगहों पर पैदा होने वाले चूजों का आकार बड़ा था। हालांकि शोर में पैदा हुए चूजों का आकार बाद में सामान्य हो जाता है, लेकिन इन पक्षियों की उम्र कम हो जाती है। पक्षी बचपन में एक-दूसरे से बात करना सीखते हैं, लेकिन शोर वाली जगहों पर यह सीखना मुश्किल हो जाता है।
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पक्षियों की जीवनशैली
पक्षी खुले आसमान में दूर-दराज के इलाकों तक उड़ सकते हैं। ये पक्षी अपनी मेहनत से घोंसला बनाते हैं। पक्षी हर जगह रह सकते हैं, जैसे पेड़ों पर, रेगिस्तान में और शहरी क्षेत्रों में भी। कई पक्षी झुंड में रहते हैं, जबकि कुछ अकेले रहना पसंद करते हैं। वे एक-दूसरे से संवाद करने के लिए चहचहाते हैं या गाने गाते हैं, जो अपने क्षेत्र की रक्षा या साथी को आकर्षित करने के लिए होता है।
पक्षी आहार के तौर पर फल, बीज और मांस खाते हैं। पक्षी अपने भोजन का इंतजाम खुद करते हैं और उसे अपने घोंसले में रखते हैं। इसी घोंसले में पक्षी अंडे देते हैं और अक्सर माता-पिता दोनों मिलकर बच्चों की देखभाल करते हैं। चूजे शुरुआती दौर में उड़ने और भोजन खोजने का अभ्यास करते हैं। उस दौरान चूजों के लिए भोजन माता-पिता ही लाते हैं।
कुल मिलाकर यह कहना गलत नहीं होगा कि ध्वनि प्रदूषण के कारण पक्षियों का जीवन-चक्र ही नष्ट हो रहा है। शोर से बचने के लिए कई बार पक्षी पलायन करते हैं। कई बार यह पलायन एक देश से दूसरे देश तक हो जाता है। इस पलायन की मंशा साफ होती है कि पक्षी अपना जीवन बचा सकें, लेकिन दुनिया में बढ़ते शहरीकरण के कारण ध्वनि प्रदूषण भी बढ़ता जा रहा है, जिसका खामियाजा पक्षियों को भुगतना पड़ रहा है।