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इजरायल वैसे मिसाइलों से हमला क्यों नहीं करता, जैसे ईरान उस पर करता है

इजरायल युद्ध के मैदान में ईरान पर वैसे मिसाइलों की बारिश क्यों नहीं करता है, जैसा अक्सर ईरान उस पर करता है। इजरायल मिसाइलों की जगह फाइटर जेट से हमला करने की रणनीति क्यों अपनाता है। आइये जानते हैं।

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ईरान की ईमाद मिसाइल। ( Photo Credit: X/@IrnaEnglish)

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अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जंग में सबकुछ देखा गया, लेकिन कुछ चीजे शायद नहीं देखी गईं। इजरायल के आसमान के ऊपर ईरानी मिसाइलों के वीडियो सब ने देखी। खाड़ी देशों के ऊपर भी ईरान अपनी मिसाइल आतिशबाजी कर चुका है। मगर तेहरान के आसमान के ऊपर मिसाइलें क्यों नहीं दिखीं। ईरानी की दर्जनों मिसाइलों को इजरायल के तरफ बढ़ते अक्सर देखा गया है। 

 

अब सवाल उठता है कि इजरायल वैसे मिसाइलों से हमला क्यों नहीं करता है, जैसे ईरान उस पर करता है। इजरायल के खिलाफ ईरान सतह से सतह तक मार करने वाली मिसाइल दागता है, जबकि इजरायल मिसाइलों की जगह फाइटर जेट से बम गिराने या सटीक मिसाइल हमला करने की रणनीति अपनाता है। आइये जानते हैं कि इसके पीछे वजह क्या है?

 

प्रेसिजन स्ट्राइक: इजरायल की सेना की दुनियाभर में पहचान प्रेसिजन स्ट्राइक के तौर पर होती है। इस रणनीति के तहत इजरायल न सिर्फ अपने टारगेट को खत्म करता है, बल्कि आसपास कोई बड़ी तबाही भी नहीं मचने देता है। आप ने अक्सर देखा होगा कि लेबनान और गाजा में तमाम इमारतों के बीच सिर्फ एक ही बिल्डिंग को इजरायल की आर्मी जमींदोज कर देती है। इससे आसपास बड़ी तबाही नहीं मचती है और काम भी बन जाता है।

 

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लाइव इंटेलिजेंस: इजरायल का हर सैन्य अभियान लाइव इंटेलिजेंस के तहत किया जाता है। मतलब यह कि टारगेट के बारे में तुरंत सूचना मिली। कुछ देर बाद ही वहां सटीक हमला कर दिया जाता है। ऐसे हमले मिसाइल से करना बेहद मुश्किल है। वजह यह है कि अगर टारगेट ने ऐन वक्त पर लोकेशन बदल दिया तो मिसाइल को रोकना मुश्किल है। हमला विफल होने के बाद टारगेट अंडरग्राउंड हो सकता है। उसके जगह बदलने से निर्दोष लोगों की जानें जा सकती हैं।

 

युद्ध को न भड़काना: इजरायल के पास घातक बैलेस्टिक और क्रूज मिसाइलों का जखीरा है। मगर उसका इस्तेमाल सबसे अंतिम विकल्प के तौर पर करना उसकी रणनीति है। बैलेस्टिक मिसाइल का इस्तेमाल बड़े और दूर के लक्ष्य को निशाना बनाने में किया जाता है। मगर इससे युद्ध के फैलने का खतरा होता है। आम नागरिकों की जान जाने पर वैश्विक स्तर पर आलोचना झेलनी पड़ सकती है। अगर बाद में ऑपरेशन में कोई बदलाव करना होता है तो मिसाइल को दागने के बाद यह संभव नहीं है। 

 

सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे: इजरायल अक्सर एफ-35 जैसे फाइटर जेट से कंट्रोल अटैक करता है, ताकि हमला भी हो जाए और युद्ध भी न भड़के। फाइटर जेट से हमला करने में यह सुविधा होती है कि ऐन वक्त में टारगेट को बदला जा सकता है। जरूरत पड़ने पर अभियान को रोका भी जा सकता है। नुकसान कम करना है या ज्यादा... सबकुछ हमले से पहले तय किया जा सकता है। फाइटर जेट इस्तेमाल करने की एक वजह यह भी है कि सबसे पहले मोसाद टारगेट की जानकारी जुटाता है। यह जानकारी सेना को भेजी जाती है। इसी सूचना के आधार पर फाइटर जेट से कंट्रोल अटैक किया जाता है। 

 

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अंतिम विकल्प: अगर इजरायल अपनी धरती से मिसाइल दागता है तो उसे रास्ते में ट्रैक किया जा सकता है। वहीं मिसाइल लॉन्चिंग स्थल की जानकारी भी दुश्मन को लग सकती है। मगर एफ-35 जैसे आधुनिक फाइटर जेट रडार को चकमा दे सकते हैं। यही कारण है कि इजरायल युद्ध में मिसाइलों से अधिक फाइटर जेट से हमला करने पर भरोसा रखता है। इजरायल की रणनीति यह भी है कि वह अपने मिसाइलों को अंतिम विकल्प के तौर पर देखता है यानी जब कोई रास्ता नहीं बचेगा तब बैलेस्टिक मिसाइल से बड़ा और व्यापक हमला किया जाएगा।


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