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ईरान पर हमले से पहले ही ट्रंप की रणनीति पर क्यों उठ रहे सवाल?

ट्रंप ईरान पर सीमित हमला करने के पक्ष में हैं, ताकि तेहरान को समझौते पर मजबूर किया जा सके। मगर विश्लेषकों का मानना है कि छोटे से भी हमले से ईरान को पलटवार करने का बहाना मिल जाएगा।

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। ( फाइल फोटो)

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अमेरिका कुछ दिनों के भीतर ही ईरान पर बड़ा हमला कर सकता है। गुरुवार को ही डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को नई धमकी दी। इसमें कहा कि तेहरान के पास 10 से 15 दिनों का समय है। अमेरिका लगातार ईरान पर समझौते का दबाव बना रहा है। दो दौर की बातचीत होने के बावजूद अभी तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है। 

 

अमेरिका की धमकी पर ईरान ने पलटवार किया। उसने कहा, '10 से 15 दिनों की समयसीमा तय करके अमेरिका संकट को न्योता दे रहा है। अगर ईरान पर हमला किया गया तो अमेरिका को सैन्य आक्रामकता का निर्णायक जवाब मिलेगा।' अब हमले के पीछे ट्रंप की एक खास रणनीति का खुलासा हुआ है। मगर यह देखना होगा कि वे अपने योजना पर कामयाब हो पाते है या नहीं।

 

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अमेरिकी प्रशासन ईरान पर हमले के मुद्दे पर बंटा है। ट्रंप के सामने उनके सहयोगियों ने सीमित हमले का प्लान कई बार पेश किया। मगर हाल ही में बड़े हमले की कार्ययोजना भी साझा की गई। ईरान पर हमला करना है या नहीं... इस पर अभी ट्रंप ने कोई फैसला नहीं लिया है। उनका पूरा प्रशासन सीमित और व्यापक हमले के बीच फंसा है।

 

हमले के पीछे ट्रंप की खास रणनीति क्या है?

वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि ईरान में कुछ ही दिनों में हमले शुरू हो सकते हैं। ये हमले बड़े नहीं होंगे। इनमें सरकारी इमारतों और सैन्य ढांचों को निशाना बनाया जाएगा। ट्रंप की रणनीति है कि सीमित हमलों से ईरान को समझौता करने पर मजबूर करने की है। हालांकि उनका यह प्लान कितना सफल होगा, यह समय बताएगा। अगर सीमित हमलों के बाद भी ईरान समझौते पर राजी नहीं हुआ तो अमेरिका बड़े स्तर पर हमले करेगा और इसका मकसद सत्ता परिवर्तन होगा।

सीमित हमले वाली रणनीति से क्या खतरा?

ट्रंप की सीमित हमले वाली रणनीति फेल भी हो सकती है, क्योंकि ईरान बार-बार कह चुका है कि अगर उस पर हमला होता है तो वह मध्य पूर्व में स्थित अमेरिकी संपत्तियों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाएगा। ईरान खुले तौर पर अमेरिकी युद्धपोतों को डुबाने तक की धमकी दे चुका है। ऐसे में दुनियाभर को चिंता सता रही है कि किसी भी हमले के जवाब में ईरान बड़ा हमला कर सकता है। अगर अमेरिका को भारी नुकसान हुआ तो वहां से शांति की राह पर लौटना मुश्किल होगा।

डिएगो गार्सिया में फंस गई ट्रंप की गाड़ी

डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि हमले में डिएगो गार्सिया एयरबेस की भूमिका अहम होगी। ट्रंप सोशल मीडिया पर लिख चुके हैं कि अगर ईरान समझौता करने से इनकार करता है तो अमेरिका को ब्रिटेन के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है, जिसमें हिंद महासागर में स्थित एक बेस भी शामिल है। बता दें कि चागोस द्वीप समूह में ही अमेरिका का डिएगो गार्सिया बेस है। इसका मालिकाना हक ब्रिटेन के पास है। अमेरिका उसकी अनुमति के बिना बेस से हमला नहीं कर सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने बेस के इस्तेमाल पर रोक लगा दी। इसे ट्रंप के लिए एक झटके के तौर पर देखा जा रहा है।

 

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संघर्ष की तैयारी में जुटा इजरायल

इजरायल का मानना है कि वार्ता विफल होने वाली है। अमेरिकी हमले के जवाब में ईरान उस पर हमला कर सकता है। यही कारण है कि इजरायल अब संघर्ष की तैयारी में जुट गया है। इजरायल की सेना अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर हमले की भी तैयारी कर रही है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि हम किसी भी स्थिति के लिए तैयार हैं। अगर अयातुल्लाह ने गलती से हम पर हमला करते हैं तो उन्हें ऐसी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ेगा, जिसकी वे कल्पना भी नहीं कर सकते। 

2003 के बाद अमेरिका की सबसे बड़ी सैन्य तैनाती

अमेरिका 2003 के बाद मध्य पूर्व में सबसे बड़ी सैन्य तैनाती करने में जुटा है। उसका यूएसएस अब्राहम लिंकन युद्धपोत अरब सागर में तैनात है। वहीं दुनिया का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत यूएसएस फोर्ड भूमध्य सागर पहुंच चुका है। तीन निर्देशित मिसाइल विध्वंसक पोत अरब सागर में तैनात हैं। यूएसएस फोर्ड अपने साथ तीन विध्वंसक जहाजों और 5,000 से अधिक जवानों के साथ मध्य पूर्व की तरफ बढ़ रहा है। पूरे इलाके में अमेरिका ने कुल 14 युद्धपोतों को तैनात किया है। इसके अलावा यहां एफ-35, एफ-22, एफ-15 और एफ-16 समेत दर्जनों लड़ाकू जेट की तैनाती भी बढ़ाई है।


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