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ईरान की तबाही, इजरायल-अमेरिका विलेन, UN के चार्टर का होगा क्या?

इजरायल, अमेरिका और ईरान की जंग में सबसे ज्यादा नुकसान ईरान को ही हुआ है। ईरान ने अपने नेतृत्व से लेकर परमाणु संयत्र और तेल प्लांट तक खोए हैं।

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तेहरान में इजरायली हमले में मची तबाही। Photo Credit: PTI

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अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले में ईरान अपने उन संस्थानों को खो रहा है, जिन पर उसकी अर्थव्यवस्था टिकी है। न्यूक्लियर प्लांट हो, गैस प्लांट हो या पेट्रोलियम प्लांट, हर जगह इजरायल और अमेरिकी हमलों में भीषण तबाही मची है। ईरान को इतना धक्का लग चुका है कि उससे उबरने में कई साल लग सकते हैं। अब एक बार फिर डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के पेट्रोलियम ठिकानों को तबाह करने की धमकी दी है।

डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह से और बिना किसी खतरे के खोलने के लिए 48 घंटे की समयसीमा दी है। उन्होंने कहा है कि अगर ईरान इस समयसीमा के भीतर स्ट्रेट नहीं खोलता, तो अमेरिका, ईरान के अलग-अलग पावर प्लांट्स पर हमला कर उन्हें तबाह कर देगा। अब ईरान ने जवाब में कहा है अगर उसके पावर प्लांट्स पर हमला होता है तो, जवाब में पूरे खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका से जुड़े सभी एनर्जी प्लांट पर हमले किए जाएंगे। जंग, ईरान पर भारी पड़ रही है।

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क्यों इस जंग में ईरान पीड़ित है, सबकी संवेदनाएं क्यों?

2024 में ईरान को मिला दर्द

ईरान ने जंग नहीं छेड़ी थी। ईरान ने इजरायल या अमेरिकी ठिकानों पर पहले हमला नहीं किया। ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर काम कर रहा था, जिससे डर की आशंका में अक्तूबर 2024 में इजरायल ने पहले ईरान पर सीधे मिसाइलें दागीं। इजरायल ने इसे 'ऑपरेशन डेज ऑफ रिपेंटेंस' का नाम दिया। 20 से ज्यादा ईरानी ठिकानों पर इजरायल की मिसाइलें गरजीं।

इजरायल ने तेहरान के आसपास रूसी निर्मित S-300 एयर डिफेंस और रडार सिस्टम को तबाह कर दिया। इजरायल ने ईरान के मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रमों को नुकसान पहुंचाया। परचिन और खोजिर के सैन्य इलाकों में हमला किया। यहां उन मशीनों को निशाना बनाया गया जो बैलिस्टिक मिसाइलों के लिए ठोस ईंधन बनाती हैं। इजरायल ने ईलाम और खुजेस्तान प्रांतों में हमला किया। बंदर इमाम खुमैनी पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स के पास एयर डिफेंस साइटों पर हमले किए। कुछ महीनों पहले 

2025 में भी बिना उकसावे के झेले हमले 

जून 2025 में इजरायल ने एक बार फिर ईरान पर बिना उकसावे के हमला बोला। 12 दिनों की जंग में ईरान को काफी नुकसान पहुंचा। अमेरिका ने इस कार्रवाई को 'ऑपरेशन मिडनाइट हैमर' कहा। दोनों देशों ने संयुक्त तौर पर हमले किए। नतांज में बने परमाणु स्थल को पूरी तरह से दोनों देशों ने तबाह कर दिया। फोर्डो और इसफहान जैसे ठिकानों पर मिसाइल हमले हुए। ये जगहों तबाह हो चुकीं हैं। ईरान का परमाणु कार्यक्रम अब दशकों पीछे चला गया है।

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नए हमले, जिनमें ईरान की रीढ़ टूट गई 

अमेरिका और इजरायल ने मिलकर 28 फरवरी को ईरान पर हमला बोला। अमेरिका ने इसे 'ऑपरेशन एपिक फ्युरी' और इजरायल ने इसे 'रोअरिंग लायन' का नाम दिया। ईरान में इन हमलों से भीषण तबाही मची है। ईरान ने अपने सर्वोच्च लीडर अली खामेनेई को खो दिया है। ईरानी सेना के अब्दुलराहीम मौसवी सहित कई शीर्ष अधिकारी मारे जा चुके हैं। IRGC कमांडर मोहम्मद पाकपुर, खामेनेई के शीर्ष सुरक्षा सलाहकार अली शमखानी, रक्षा मंत्री अजीज नासिरजादेह और सशस्त्र बलों के चीफ ऑफ स्टाफ मूसावी की भी मौत हुई।

ईरानी मीडिया का कहना है कि 190 से ज्यादा ईरानी बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्चर अब तक तबाह हो चुके है। लगभग 130 नौसैनिक जहाजों को डुबो दिया गया। तेहरान भी खंडहर हो रहा है। तेहरान के शरान ऑयल डिपो जैसे तेल भंडारण केंद्रों और कुछ सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचा है। इजरायल ने साउथ पार्स में इजरायल के गैस भंडार को भी तबाह किया है, जिस प्रोजेक्ट को खड़ा करने में ईरान को दशकों लगे हैं। 

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ईरान को हुए नुकसान की भरपाई कैसे हो सकती है?

दीवान लॉ कॉलेज में, इंटरनेशनल स्टडीज पढ़ाने वाले असिस्टेंट प्रोफेसर निखिल गुप्ता ने बताया कि ईरान के पास संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के तहत एक अधिकार है, जिसे लेकर वह दोनों देशों को घेर सकता है। यह किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल प्रयोग को प्रतिबंधित करता है। ईरान और अमेरिका, दोनों ने इस चार्टर का उल्लंघन किया है।

ईरान यह तर्क दे सकता है कि अमेरिका और इजरायल का हमला बिना किसी उकसावे के है और यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। ईरान पर हमले हो रहे हैं। ईरान के पास तर्क है कि वह अनुच्छेद 51 का हवाला देकर, जवाबी कार्रवाई कर सकता है। खाड़ी के देशों में ईरान के हमले, आत्मरक्षा के तहत आएंगे। ईरान सुरक्षा परिषद से इस हमले को रोकने और हमलावर देशों पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर सकता है। विडंबना यह है कि जिस देश ने हमला किया है, वह  संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य है। 

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युद्ध की स्थिति में भी कुछ मानवीय कानून लागू होते हैं। जिनेवा कन्वेंशन के तहत ये अधिकार मिले हैं। ईरान पर हुए हमलों में स्कूल, अस्पताल और रिहायशी इलाकों पर हमले हुए हैं। ईरान इसे युद्ध अपराध घोषित करने की मांग कर सकता है। ईरान अपनी संप्रभुता और सीमाओं के उल्लंघन के लिए मुआवजे और कानूनी निंदा की मांग कर सकता है। ईरान, अब दुनिया से प्रतिबंध हटाने की मांग कर सकता है। 

मुश्किलें क्या हैं?

असिस्टेंट प्रोफेसर निखिल गुप्ता ने कहा, 'अमेरिका, ज्यादातर वैश्विक संस्थाओं को फंडिंग देता है। सबसे बड़ा सरपंच होने का दावा भी अमेरिका ही करता है। अमेरिका, दुनिया पर युद्ध और शांति से जुड़े समझौतों को थोपता है, खुद कोई समझौता नहीं मानता है। आर्थिक और सामरिक वजहों की वजह से वैश्विक संस्थाएं उस पर दबाव भी नहीं बना पाती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक, अमेरिका की निंदा कई बार हुई है, बकाया मांगा गया है, अमेरिका ने मांग ही खारिज कर दी है।'


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