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ईरान जंग ने कैसे बढ़ाई पाकिस्तान की उलझन, सऊदी अरब आजमाने में क्यों जुटा?

ईरान जंग में पाकिस्तान अपने ही जाल में फंसता दिख रहा है। पिछले साल जिस रक्षा समझौते का जिक्र पाकिस्तान के मंत्री करते थे। अब उसकी अग्निपरीक्षा देनी पड़ रही है।

Shahbaz Sharif and Asim Munir

शहबाज शरीफ और असीम मुनीर। ( फाइल फोटो )

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मध्य पूर्व में बढ़ती जंग के बीच पाकिस्तान सबसे बड़ी दुविधा में फंस चुका है। पिछले साल सितंबर में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पारस्परिक रक्षा समझौता हुआ। इसे पाकिस्तान ने खूब प्रचारित किया। मगर सऊदी अरब ने सार्वजनिक मंचों से ज्यादा कुछ नहीं कहा गया। समझौते के मुताबिक किसी एक देश पर हमला दूसरे देश पर हमला माना जाएगा। बाद में खबरें ऐसी भी आईं कि पाकिस्तान-सऊदी अरब के बीच हुए रक्षा समझौते में तुर्की भी शामिल होना चाहता है, ताकि इसे 'इस्लामिक नाटो' का रूप दिया जा सके।

 

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग में सबसे बड़ी परीक्षा पाकिस्तान के इसी रक्षा समझौते की है। एक तरफ जहां पाकिस्तान अपने पड़ोसी अफगानिस्तान से जंग लड़ रहा तो वहीं घरेलू मोर्चे पर भी उसकी मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। बलूचिस्तान में अलगाववादी और खैबर पख्तूनख्वा में टीपीपी के लड़ाकों ने मोर्चा खोल रखा है। पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत के साथ भी उसके रिश्ते बेहद नाजुक दौर से गुजर रहे हैं।  ऐसे में ईरान के दुश्मनी मोल लेना उसके बस की बात नहीं है।

 

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पाकिस्तान की सऊदी अरब पर निर्भरता दशकों से है। ईंधन और वित्तीय मदद के मामले में पाकिस्तान का सबसे करीबी दोस्त रहा है। ईरान के कई मिसाइल और ड्रोन हमलों के बावजूद पाकिस्तान खुलकर सऊदी अरब के साथ खड़ा होता नहीं दिख रहा है। हालांकि उसके बयान से झुकाव जरूर रियाद की तरफ दिख रहा है, लेकिन इस्लामाबाद ईरान के मामले में संयम और संवाद का रास्ता अपना रहा है।

पाकिस्तान को अजमाने में जुटा सऊदी अरब 

ईरान हमलों के बीच सऊदी अरब को पाकिस्तान से काफी उम्मीदें हैं। उसको लगता है कि इस्लामाबाद अपनी प्रतिबद्धता पर खरा उतरेगा। पाकिस्तान में करीब 4 करोड़ शिया मुस्लिम हैं। अगर ईरान के खिलाफ वहां की सरकार कोई कदम उठाती है तो देश के भीतर उसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। हाल ही में पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर ने सऊदी अरब के रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान से मुलाकात की थी। इसमें संयुक्त रणनीतिक समझौते के तहत ईरानी हमलों को रोकने पर चर्चा हुई थी। अब रियाद यह देखना चाहता है कि पाकिस्तान की कथनी और करनी एक रूप है या नहीं। 

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सऊदी को खुला समर्थन देने से नुकसान क्या-क्या?

  • पाकिस्तान में ईंधन का संकट बेहद गहरा चुका है। सरकार को स्कूल और दफ्तरों को बंद करना पड़ रहा है। अगर खुलकर इस्लामाबाद ने सऊदी अरब का साथ दिया तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती होर्मुज जलडमरूमध्य से ईंधन का आयात करना होगा। इस स्थिति में ईरान की सेना खुलकर पाकिस्तानी जहाजों को नुकसान पहुंचा सकती है। अगर पाकिस्तान ने लाल सागर के रास्ते सऊदी अरब से तेल आयात करने की कोशिश की तो भी यमन में मौजूद ईरान के प्रॉक्सी हूती विद्रोही उसके जहाजों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

 

  • सऊदी अरब का खुला साथ देने से पाकिस्तान के सामने एक खतरा यह भी पैदा करेगा कि उसके दक्षिण-पश्चिम सीमा पर ईरान एक नया मोर्चा खोल सकता है। अभी पाकिस्तान पश्चिमी सीमा पर अफगान तालिबान और टीपीपी से लड़ने में अपनी ताकत झोंक रहा है। 

 

  • अगर पाकिस्तान ईरान के दबाव में सऊदी अरब का साथ नहीं देता है तो दोनों देशों के बीच हुए कथित रक्षा समझौते की न केवल पोल खुलेगी, बल्कि इस्लामाबाद के प्रति रियाद का अविश्वास भी बढ़ेगा। जवाब में सऊदी अरब कड़ी प्रतिक्रिया दे सकता है। लोन री-पेमेंट औ वित्तीय सहायता पर बड़े एक्शन भी ले सकता है। 

 

एक्सपर्ट का नजरिया: मिडिल ईस्ट काउंसिल ऑन ग्लोबल अफेयर्स में हबीब विश्वविद्यालय में ग्लोबल फेलो अल्बर्ट बी. वुल्फ लिखते हैं, इस्लामाबाद रियाद का साथ तब देता है जब उसे लगता है कि वह लागत को वह कर लेगा और खतरा दूर है। जब परिस्थितियां अनुकूल नहीं होती हैं तो वह पीछे हटने के बहाने ढूंढ लेता है। 

पहले भी पाकिस्तान दे चुका 'धोखा'

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सैन्य सहयोग दशकों पुराना है। मगर एक दशक पहले यानी 2015 में एक दिसचस्प घटना घटी थी। उस वक्त संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ने यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग छेड़ दी थी। इसमें पाकिस्तान ने सऊदी अरब और यूएई का साथ नहीं दिया था। यहां तक कि संसद से भी साथ न देने का ऐलान कर दिया गया था।

 

बाद में संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ने खुलकर पाकिस्तान की आलोचना की थी। मगर पाकिस्तान ने यह कदम इसलिए उठाया था, ताकि ईरान के साथ उसके रिश्ते न बिगड़े, क्योंकि हूती विद्रोहियों को ईरान खुला समर्थन देता है। 

अमेरिका के जिक्र से बचते हैं शहबाज शरीफ

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ दुनिया के उन पर चुनिंदा नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने सबसे पहले ईरान पर हमले और अली खामेनेई की हत्या का विरोध किया। मोजतबा खामेनेई के सुप्रीम लीडर बनने पर भी सबसे पहले बधाई देने वालों में शहबाज शरीफ का नाम शुमार हैं। वे अपने भाषणों और सोशल मीडिया पोस्ट पर ईरान के साथ खड़े होने का दावा करते हैं। इजरायल की खुलकर आलोचना करते हैं, लेकिन अमेरिका का जिक्र करने से साफ-साफ बचते हैं।


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