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युद्धविराम के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुला या नहीं, अब कितने जहाज गुजर रहे?

अमेरिका और इजरायल के बीच सीजफायर हो चुका है। अब सबकी निगाह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर है। ईरान यहां अपना नियंत्रण चाहता है। मगर दुनिया की ख्वाहिश स्वतंत्र तौर पर आवागमन की है।

Strait of Hormuz

सांकेतिक फोटो। (AI Generated Image)

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अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध थम चुका है। मगर अभी तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह से नहीं खुला है। पिछले 24 घंटे में यहां से सिर्फ एक तेल टैंकर और पांच अलग-अलग ड्राई बल्क कैरियर को ही गुजरने दिया गया है।

 

केप्लर, सिग्नल ओशन और लॉयड्स लिस्ट इंटेलिजेंस के डेटा के मुताबिक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लगभग पूरी तरह से बंद है। युद्ध के बाद से ही रोजाना यहां बहुत कम टैंकरों की आवाजाही हो रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ के ट्रेड एंड डेवलपमेंट डेटा के मुताबिक युद्ध से एक दिन पहले 27 फरवरी को 147 जहाज यहां से गुजरे थे। वहीं युद्ध वाले दिन 28 फरवरी को इनकी संख्या घटकर 81 हो गई थी।

 

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एक मार्च को 20 और 7 मार्च को सिर्फ 4 हजार ही गुजरे। संयुक्त राष्ट्र के डेटा के मुताबिक होर्मुज की खाड़ी से दुनियाभर की जरूरत का 38 फीसद कच्चा तेल, 29 फीसद एलपीजी, 19 प्रतिशत और 13 फीसद केमिकल्स की आवाजाही होती है। 

यूरोपीय यूनियन ने क्या कहा?

युद्धविराम समझौते के मुताबिक ईरान होर्मुज की खाड़ी को खुलेगा लेकिन यहां उसका ही नियंत्रण होगा। हालांकि खाड़ी के अन्य देश इसके खिलाफ हैं। वहीं यूरोपीय यूनियन ने भी जहाजों के स्वतंत्र और बिना किसी टोल के भुगतान के सुनिश्चित करने की मांग की। यूरोपीय आयोग के प्रवक्ता अनवर एल अनौनी ने ब्रुसेल्स में कहा, 'अंतरराष्ट्रीय कानून नौवहन को स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। इसका अर्थ है कि किसी भी प्रकार का कोई भुगतान या शुल्क नहीं होना चाहिए। नौवहन की स्वतंत्रता सार्वजनिक हित में है। इसे सुनिश्चित किया जाना चाहिए।'

 

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खाड़ी के देशों की क्यों बढ़ी टेंशन

प्लान के तहत ईरान होर्मुज की खाड़ी में टोल लगाने की योजना पर विचार कर रहा है। अगर ऐसा हुआ तो यहां से गुजरने वाले हर जहाज को भुगतान करना होगा। हालांकि खाड़ी के देश इससे चिंतित हैं। उनका डर है कि अगर अमेरिका ने जल्दबाजी में अपना बोरिया-बिस्तर बांधा तो पूरी खाड़ी पर ईरान का नियंत्रण हो जाएगा। हाल ही में खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) ने इस बात पर जोर दिया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोला जाए और किसी भी समझौते के नतीजे स्थायी और दीर्घकालिक होने चाहिए। 

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