तमिलनाडु के चुनाव के बारे में यह माना जा रहा है कि सत्ताधारी द्रविड़ मुनेत्र कझगम (DMK) और कांग्रेस गठबंधन की वापसी हो सकती है। पिछले चुनाव में बुरी तरह हारकर बाहर हुई ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम (AIADMK) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के गठबंधन को अपेक्षाकृत कमजोर माना जा रहा है। नए नवेले नेता बने थलपति विजय की पार्टी तमिलागा वेट्री कझगम (TVK) को लेकर भी अभी उतना भरोसा नहीं बन पा रहा है। इस सबसे इतर अगर 2021 में हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों को ध्यान से देखें तो ये नतीजे इशारा करते हैं कि बाजी पलट जाए तो बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इसकी बड़ी वजह है कि राज्य में विपक्षी NDA गठबंधन को कुल 75 सीटों पर जीत मिली थी और वह बहुमत के लिए जरूरी 118 सीटों से 43 सीट दूर था। रोचक बात है कि राज्य की 39 सीटें ऐसी थीं जिन पर जीत हार का अंतर 5000 से भी कम वोटों का था।
कम वोटों का अंतर यह दिखाता है कि बाजी किसी के भी पक्ष में पलट सकती है। 2021 से लेकर अब तक कई बदलाव हुए हैं। सबसे बड़ा बदलाव स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) है। लगभग 70 लाख वोटरों के नाम तमिलनाडु की वोटर लिस्ट से कट गए हैं। औसतन हर सीट पर 30 हजार वोट कटे हैं। यह दिखाता है कि वोट कटने का कितना बड़ा असर इस चुनाव पर पड़ने वाला है। दूसरी बात यह है कि पिछली बार भले ही कई दल अलग से लड़े थे मुख्य लड़ाई DMK और AIADMK की थी। सत्ता में AIADMK थी, उसमें बिखराव हुआ था और DMK ने जमकर पसीना बहाया था। इस बार मामला त्रिकोणीय होने की उम्मीद है क्योंकि थलपति विजय की TVK कई सीटों पर मजबूत स्थिति में मानी जा रही है।
2021 के चुनाव नतीजे समझिए
बहुत कमजोर होने के बावजूद AIADMK को तमिलनाडु में कुल 33.5 प्रतिशत वोट मिले थे और सत्ता में आई DMK को 38 प्रतिशत वोट मिले थे। DMK के साथ लड़ी कांग्रेस को 4.3 प्रतिशत वोट मिले थे। DMK वाले गठबंधन में शामिल VCK को सिर्फ 1 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि NDA में शामिल PMK को 3.8 प्रतिशत वोट मिले थे। इस तरह NDA को कुल 40 प्रतिशत वोट के साथ 75 सीटों पर जीत मिली थी। दूसरी तरफ 159 सीटें जीतने वाली डीएमके-कांग्रेस गठबंधन को 45.7 प्रतिशत वोट मिले थे।
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इस बार NDA ने अपनी रणनीति बदली है। BJP, AIADMK और PMK के अलावा, टीटीवी दिनाकरण की AMMK को 18, टीएमसी (एम) को पांच और कई अन्य दलों को भी शामिल करके कुछ सीटें बांटी गई हैं। एनडीए को उम्मीद है कि वह वोटों के बिखराव को रोक सकेगा और इसका फायदा उसे कई सीटों पर मिल भी सकता है।
कम मार्जिन वाली सीटें
पिछले चुनाव में 8 सीटें ऐसी थीं जिन पर जीत और हार का अंतर 1000 वोट से भी कम था। इनमें से 5 सीटों पर डीएमके वाले SPA को 5 सीटों पर जीत मिली और NDA को तीन सीटों पर जीत मिली थी। 1000 से 2000 वोटों के अंतर वाली कुल 11 सीटें थीं। इनमें से 7 सीटों पर SPA और 4 सीटों पर NDA को जीत मिली थी। 5 सीटें ऐसी थीं जिन पर जीत और हार का अंतर 2 से 3 हजार वोटों के बीच था। इसमें से 3 पर SPA और 2 पर NDA को जीत मिली थी। 3 से 4 हजार के अंतर वाली कुल 7 सीटों में से एनडीए को 4 और SPA को तीन सीटों पर जीत मिली थी। इसी तरह 8 सीटें ऐसी थीं जिन पर हार और जीत का अंतर 4 से 5 हजार वोटों के बीच था। इनमें से 5 पर SPA तो 3 सीटों पर NDA को जीत मिली थी।
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इस तरह 5 हजार से कम वोटों के अंतर वाली कुल 39 सीटें थीं। इनमें से 26 सीटों पर डीएमके की अगुवाई वाले SPA को जीत मिली थी और 13 सीटों पर NDA को जीत मिली थी। अब अगर थलपति विजय की पार्टी सत्ताधारी पार्टी के वोट काटती है और NDA अपना वोटबैंक बचाते हुए नई पार्टियों के सहयोग से छोड़ी बहुत भी लीड ले पाता है तो उसकी सीटों की संख्या सिर्फ इन सीटों को जीतने से 100 के पार पहुंच सकती है।
इसी तरह 30 और सीटें हैं जिन पर 5 से 10 हजार का मार्जिन था। उनमें भी ज्यादा सीटें SPA के खाते में गई थीं। अगर इन सीटों पर भी SPA कमजोर होता है और NDA अपने वोटबैंक को एकजुट कर पाती है तो उसकी राह बेहद आसान हो जाएगी।