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मछली और चमड़ा वाले उद्योग युद्ध से कैसे परेशान हो गए? समझिए पूरी बात

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच छिड़ी जंग की वजह से कई देश, तेल संकट के मुहाने पर खड़े हैं। भारत भी इन्हीं देशों में शामिल है। इसका असर और कहां पड़ा है, आइए समझते हैं।

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AI इमेज। Photo Credit: Sora

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एशिया, जंग के साए में हैं। इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच छिड़ी जंग के असर से अब दुनिया तेल संकट का सामना कर रही है। बहरीन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, इराक और कुवैत जैसे देशों पर ईरानी मिसाइलें कहर बरपा रही हैं। ईरान ने 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' की ऐसी नाकेबंदी की है कि वहां उसकी मर्जी के बिना कोई जहाज नहीं गुजर सकता है। होर्मुज ब्लॉक होने की वजह से भारत की भी ऊर्जा आपूर्ति बाधित हुई है।

भारत में लिक्विड पेट्रोलियम गैस (LPG) और लिक्विड नेचुरल एजेंसी (LNG) की किल्लत जैसी स्थिति आने वाली है। भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए  90 फीसदी आयात पर निर्भर है। भारत, LPG का 60 फीसदी से ज्यादा हिस्सा खरीदता है, जिसकी बड़ी खेप, खाड़ी के देशों से आती है। सिर्फ यही नहीं भारत की मुश्किलें चौतरफा बढ़ रही हैं। भारत का मछली और चमड़ा उद्योग भी प्रभावित हुआ है।

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मछली और चमड़ा वाले उद्योग पर असर क्यों?

पश्चिम एशिया  में चल रहे अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष की वजह से भारत अपने उत्पाद, खाड़ी के देशों में भेज नहीं पा रही है। उत्पाद तैयार हैं लेकिन समुद्र और हवाई अड्डों पर अनिश्चितता की स्थिति में उन्हें रोका गया है। कोरोना महामारी, चीन के साथ राजनीतिक तनाव और ट्रंप सरकार की 50 फीसदी टैरिफ जैसी पुरानी चुनौतियों से यह सेक्टर उबर तो गया था लेकिन अब नए संकट ने एक बार फिर मुश्किलें बढ़ा दीं हैं।

नुकसान क्या हो रहा है?

कोलकाता से ही समुद्री रास्ते के जरिए हर महीने करीब 3,000 टन कार्गो निर्यात करने जाता है। भारतीय उत्पाद, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, बहरीन, सऊदी अरब, ओमान, यूरोप, अमेरिका और कनाडा जैसे देशों में भेजे जाते हैं। इसमें से 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सा, चमड़े के उत्पादों से जुड़ा है।

कपड़े, ऑटोमोबाइल पार्ट्स, मशीनरी और सब्जियां, मछली, मीट जैसी जल्दी खराब होने वाली चीजें भी बड़ी मात्रा में भेजी जाती हैं। अमीरात और कतर एयरवेज से इन उत्पादों को भेजा जाता है। 28 फरवरी को जंग छिड़ने के बाद से कई भारतीय शिपमेंट या तो अटक गए हैं, या उन्हें रोक लिया गया है।

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क्यों अब तक नियंत्रण में नहीं आईं परिस्थितियां?

खाड़ी के देशों में जंग के हालात हैं। ऐसी स्थिति में निर्यातकों को शिपमेंट भेजने में भी डर लग रहा है। कतर ने अभी तक उड़ानें सीमित रखीं हैं। अमीरात का भी हाल ऐसा ही है। जल्दी खराब न होने वाले उत्पादों पर लगने वाला ट्रांसपोर्ट चार्ज जहां पहले 150 से 180 रुपये प्रति किलो था, अब यह बढ़कर 400 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। दूध, मांस, मछली, फल और सब्जियों जैसे जल्द खराब होने वाले उत्पादों पर अभी तक UAE ने ट्रांसपोर्ट चार्ज बढ़ाने का फैसला नहीं किया है। अगर ऐसे ही हालात रहे तो संकट और बढ़ेगा। 

किस इंडस्ट्री पर ज्यादा असर पड़ा?

लेदर गुड्स पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है। द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट बताती है कि जर्मनी के लिए 1.5 टन लेदर वॉलेट की खेप 27 फरवरी से एयरपोर्ट पर अटकी है, क्योंकि कतर एयरवेज ने उड़ानें नहीं शुरू कीं। पूर्वी भारत से हर साल 5,000 करोड़ रुपये के लेदर गुड्स एक्सपोर्ट होते हैं। वॉलेट, बेल्ट, इंडस्ट्रियल ग्लव्स और फिनिश्ड लेदर जैसे प्रोडक्ट बाहर भेजे जाते हैं। अब पुराना डिलीवर न होने की वजह से नए ऑर्डर नहीं आ रहे, क्योंकि निर्यातकों को इंतजार है कि हालात बेहतर होंगे।  

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जोखिम क्या है?

जंग की वजह से हालात ऐसे बने हैं कि अब फ्रांस से आने वाले निर्यातक भी डरे हुए हैं। उड़ानें रुकी हैं, दूसरा खतरा कोई मोल नहीं लेना चाहता है। लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते यूरोप के लिए भेजे जाना वाला लेदर एक्सपोर्ट भी प्रभावित है। अब इन जहाजों और उत्पादों का इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ गया है।

भारत यूरोप, अमेरिका और वेस्ट एशिया को इंडस्ट्रियल ग्लव्स और गारमेंट्स बेचता है। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट बताती है कि नए ऑर्डर में 25 फीसदी से ज्यादा गिरावट देखी जा रही है। ट्रांसपोर्ट चार्ज बढ़ने से एक्सपोर्टर को डिस्काउंट देना पड़ रहा है। बहरीन को हर दो महीने में 15,000 इंडस्ट्रियल गारमेंट्स अब तक भेजा जाता रहा है। यह शिपमेंट भी रुक गई है। शिपिंग कंपनियां 1,000-2,000 डॉलर एक्स्ट्रा इमरजेंसी और पीक सीजन चार्ज लगा रही हैं।

मछली निर्यातक क्यों परेशान हैं?

मछली निर्यातकों को भी परेशानी हो रही है। सीफूड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन का कहना है कि अमेरिका ने  50 फीसदी से जब टैरिफ घटाकर 18 फीसदी तक किया था, तब कुछ राहत मिली थी। अब नए संकट सामने हैं। फ्रेट चार्ज होने से कुछ राहत मिली थी, लेकिन अब नया संकट है। 

ट्रांसपोर्ट महंगा हो गया है, 28 फरवरी से खाड़ी के देशों को जाने वाली ज्यादातर शिपमेंट रोक दी गई है। ज्यादातर उत्पादों को कोल्ड स्टोरेज में रखा गया है। भारत कुवैत और बहरीन जैसे देशों में खूब मछलियां बेचता है। मीट आयातकों को भी परेशानी झेलनी पड़ रही है। इस जंग की वजह से लोग परेशान हो रहे हैं। लागत बढ़ गई है और भविष्य अधर में है। |

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व्यापार के आंकड़े क्या कह रहे हैं? 

मारिन प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (MPEDA) के आंकड़े बताते हैं कि साल 2024 और 2025 के बीच भारत ने खाड़ी देशों के साथ करीब 278.31 मिलियन डॉलर का कारोबार किया है। खाड़ी के देशों में झींगा और फ्रोजन मछलियों की भारी डिमांड रहती है। ताजी मछलियां भी भेजी जाती हैं। खाड़ी के देशों में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भारतीय समुद्री उत्पादों का सबसे बड़ा खरीदार है। इसके बाद सऊदी अरब और ओमान हैं लेकिन हर जगह से जंग की वजह से कारोबार ठप है। 

लेदर इंडस्ट्री पर भी संकट के बादल 

साल 2024-25 में लेदर और फुटवियर निर्यात में करीब 25 फीसदी इजाफा देखा गया था लेकिन अब नई चुनौतियां हैं। पहले अमेरिकी टैरिफ की वजह से व्यापार बाधित हुआ और अब जंग की वजह से। अमेरिका भारत के कुल लेदर एक्सपोर्ट का 21 फीसदी हिस्सा खरीदता था, अब बाधित है। टैरिफ जैसी चुनौतियां बनी हुईं हैं। जर्मनी, यूके, इटली और फ्रांस तक अब भारत अपने उत्पाद भेज नहीं पा रहा है। खाड़ी के देशों में भी ऐसी ही आशंकाएं बनी हुईं हैं। भारतीय निर्यातक इस उम्मीद में हैं कि जल्द ही जंग थमे और एक बार फिर व्यापार सामान्य हो। 


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