भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार, पहली बार किसी एक कानून को लोकसभा से पास कराने में असफल रही है। लोकसभा में महिलाओं के आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक शुक्रवार को खारिज हो गया। यह अधिनियम अगर पास होता तो संविधान का 131वां संशोधन होता। भारतीय जनता पार्टी के पास विधेयक को पास कराने के लिए जिस संख्या बल की जरूरत थी, वह पार्टी के पास नहीं है। सदन में बिना विपक्ष के सहयोग के इसे पास नहीं कराया जा सकता था। मोदी सरकार के इस महत्वाकांक्षी विधेयक को पास करने के लिए सदन में 2 तिहाई वोटों की जरूरत पड़ रही थी।
विधेयक के गिरते ही केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस नतीजे को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। उन्होंने कहा कि केंद्र शासित प्रदेशों और परिसीमन से जुड़े दो अन्य विधेयक, जो इस संवैधानिक संशोधन से सीधे तौर पर जुड़े थे, अब गिर गए हैं। सरकार अगर इन्हें दोबारा पास कराना चाहती है तो फिर 2 तिहाई बहुमत की जरूरत होगी, जो सरकार के पास नहीं है। ऐसा नहीं है कि सरकार के पास सदन में बहुमत नहीं है, सिर्फ इस विधेयक के लिए जरूरी बहुमत नहीं था। ऐसे संवेदनशील विषय, आमतौर पर बिना विपक्षी सहयोग के पास नहीं होते। किसी भी सरकार के पास 2 तिहाई बहुमत, संसदीय इतिहास में नहीं रहा है।
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किरेन रिजिजू, संसदीय कार्यमंत्री:-
भारत की महिलाओं को जो अधिकार देना था, वह नहीं देने पर अगर कांग्रेस जश्न मना रही है तो इससे दुखद कुछ और नहीं हो सकता। भारत की महिलाएं कभी भी कांग्रेस और विपक्ष को माफ नहीं करेंगी। गृह मंत्री ने सदन में कहा कि आपको तकनीकी दिक्कतें हैं तो हम संशोधन के लिए तैयार हैं, लिखित में चाहिए तो हम लिखित में भी देने को भी तैयार हैं। कांग्रेस की मंशा साफ थी कि महिलाओं को आरक्षण न मिले। कांग्रेस बेनकाब हो गई है। हम महिलाओं का अधिकार उन्हें दिलाकर रहेंगे। कांग्रेस पार्टी और उनके साथियों ने यह स्थापित कर दिया कि वे महिला विरोधी है। शब्दों से वे अपना पाप साफ नहीं कर सकते। देश की महिलाएं कांग्रेस और उनके साथियों को कभी माफ नहीं करेगी।
12 साल में मोदी सरकार की पहली बहार
लोकसभा में महिलाओं को आरक्षण देने वाला मोदी सरकार का बड़ा बिल शुक्रवार को असफल रहा। यह 12 साल में मोदी सरकार की पहली संसदीय हार है। विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आखिरी समय के अपील और गृह मंत्री अमित शाह के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। अमित शाह ने कहा था कि सभी राज्यों में लोकसभा सीटें 50 प्रतिशत बढ़ा दी जाएंगी, लेकिन विपक्ष नहीं माना।
संसद में कैसे मोदी सरकार की हार हुई?
संविधान के 131वें संशोधन विधेयक के समर्थन में 298 सांसदों ने वोट दिया। विरोध में 230 मत पड़े। इस विधेयक को पास होने के लिए कम से कम 352 वोट चाहिए थे। विधेयक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका। विपक्ष का आरोप था कि यह बिल 2029 से महिलाओं को आरक्षण देने का नाम लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों की लोकसभा में हिस्सेदारी कम करने, राजनीतिक नक्शा बदलने और जाति गणना टालने की साजिश है।
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MK स्टालिन, DMK अध्यक्ष:-
आप लोगों ने जो जिम्मेदारी मुझे तमिलनाडु का मुख्यमंत्री बनाकर सौंपी है, उसी के बल पर स्टालिन की सुलगाई चिंगारी ने दिल्ली के अहंकार को खाक कर दिया है। परिसीमन के खिलाफ हमारी लड़ाई सफल रही है। यह AIADMK महासचिव ईके पलानीस्वामी के लिए भी चुनाव से पहली हार है।
गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि दक्षिण राज्यों की हिस्सेदारी थोड़ी बढ़ेगी और सरकार जाति गणना के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन विपक्ष ने उन्हें नहीं माना। बिल के फेल होने के बाद संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि इससे जुड़े दो अन्य बिल, जिनमें सीमा निर्धारण (परिसीमन) वाला बिल भी शामिल है, वापस ले लिए जाएंगे। इन बिलों को अब राज्यसभा में नहीं पेश किया जाएगा।
एस जयशंकर, विदेश मंत्री:-
आज हम सबने कांग्रेस, TMC, DMK और समाजवादी पार्टी का असली चेहरा देखा। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें रिजर्व करने वाले संवैधानिक संशोधन को रोककर, उन्होंने महिलाओं को उनके जायज़ अधिकारों से वंचित किया है। देश देख रहा है और इसकी महिलाएं भी। आज नारी शक्ति का जो अपमान हुआ है, उसे कभी माफ नहीं किया जाएगा।
अब कैसे इसे भुना रही है बीजेपी?
मतदान से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने सांसदों से अपील की थी कि वे अपनी अंतरात्मा पर विचार करें और परिवार की महिलाओं को याद करें। उन्होंने कहा कि महिलाओं को उनका हक देने का समय आ गया है। बिल के हारने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को महिला विरोधी बताया। एनडीए की महिला सांसदों ने संसद परिसर में बारिश के बाद भी विरोध प्रदर्शन किया।
भारतीय जनता पार्टी के नेता एक सुर में विपक्ष पर हमला बोल रहे हैं। उनका कहना है कि विपक्ष महिला विरोधी है, उनकी वजह से महिलाओं को उनका हक नहीं मिल पा रहा है। विधेयक के असफल होने को लेकर बीजेपी और सहयोगी गठबंधन के नेता, द्रविड़ मुनेत्र कझगम (DMK), तृणमूल कांग्रेस (TMC) और कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों को घेरना शुरू कर दिया है।
तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में अभी चुनाव होने वाले हैं। तीनों जगहों पर बीजेपी की अगली रणनीति यही है कि सत्तारूढ़ दलों को महिला विरोधी साबित किया जाए।
शहजाद पूनावाला, प्रवक्ता, बीजेपी:-
यह भारत की महिलाओं और सभी लोकतंत्र प्रेमियों के लिए बहुत दुखदाई पल है कि जो महिलाओं का अधिकार था उसे रोकने के लिए कांग्रेस पार्टी ने सिर्फ बीजेपी, प्रधानमंत्री मोदी का विरोध करते हुए नारी शक्ति के अधिकारों का गला घोंट दिया। प्रधानमंत्री मोदी, बीजेपी, NDA महिलाओं को अधिकार देने के पक्ष में थी लेकिन कांग्रेस पार्टी ने किसी न किसी तरह से इसे रोक दिया। देश की महिलाएं इन्हें इस ऐतिसाहिक भूल के लिए कभी माफ नहीं करेंगी।
बीजेपी चुनावी लाभ कैसे ले सकती है?
केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव अभी नहीं हुए हैं। असम का चुनाव निपट गया है। अब बीजेपी इन राज्यों में महिला विरोध को प्रमुखता से उठाने वाली है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पहले ही एलान कर दिया है कि अब विपक्ष को आने वाले चुनावों में इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। उन्होंने पार्टी लाइन को यह इशारा भी कर दिया है कि महिला कानून और परिसीमन को लेकर कैसे विपक्ष को घेरना है। उन्होंने इसे लेकर एक स्पष्ट योजना भी तैयार कर दी है।
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अमित शाह, केंद्रीय गृह मंत्री:-
आज लोकसभा में बहुत अजीब दृश्य दिखा। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लिए जरूरी संविधान संशोधन बिल को कांग्रेस, TMC, DMK और समाजवादी पार्टी ने पारित नहीं होने दिया। महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के बिल को गिरा देना, उसका उत्साह मनाना और जयनाद करना सचमुच निंदनीय और कल्पना से परे है। अब देश की महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 फीसदी आरक्षण, जो उनका अधिकार था, वह नहीं मिल पाएगा।
अमित शाह ने अब क्या संदेश दिया है जो विपक्ष पर भारी पड़ेगा?
अमित शाह ने कहा, 'कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने यह पहली बार नहीं किया, बल्कि बार-बार किया है। उनकी यह सोच न महिलाओं के हित में है और न देश के। मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि नारी शक्ति के अपमान की यह बात यहां नहीं रुकेगी, दूर तक जाएगी। विपक्ष को महिलाओं का आक्रोश न सिर्फ 2029 लोकसभा चुनाव में, बल्कि हर स्तर, हर चुनाव और हर स्थान पर झेलना पड़ेगा।
अमित शाह ने विधेयक के गिरने के बाद जो कहा है, वह इशारा कर रहा है कि अब चुनावी राज्यों में विपक्ष और बुरी तरह से घिरने वाला है-
पश्चिम बंगाल में अब एजेंडा क्या होगा?
पश्चिम बंगाल, एक अरसे तक, मातृ सत्तात्मक समाज रहा है। ममता बनर्जी जिस 'मां, माटी, मानुष' का सहारा लेने के लिए राज्य में सियासत करती हैं, बीजेपी उसी पर उन्हें घेर रही है। पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में, जहां 'महिला अस्मिता' और 'मां-माटी-मानुष' का नैरेटिव हावी है, बीजेपी इसे मौके की तरह इस्तेमाल कर सकती है। बीजेपी नेता कह रहे हैं कि बीजेपी तो महिलाओं का कल्याण करना चाहती थी, टीएमसी ने होने नहीं दिया।
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के पास 33 सांसद हैं। 33 में 11 महिला सांसद हैं। टीएमसी में महिलाओं का प्रतिनिधित्व ज्यादा है, फिर भी बीजेपी महिला उत्पीड़न के नाम पर सरकार को घेरती है। संदेशखाली, आरजी कर मेडिकल कॉलेज रेप केस, सिंगूर, नंदीग्राम और पार्क स्ट्रीट जैसी घटनाओं को लेकर ममता सरकार की हमेशा आलोचना करती है। बीजेपी को एक और मौका मिल गया है। बीजेपी पश्चिम बंगाल में महिलाओं की सुरक्षा से लेकर उनके शिक्षा और राजनीतिक पहुंच तक को लेकर ममता बनर्जी को घेर रही है।
तमिलनाडु और केरल में क्या एजेंडा है?
केरल और तमिलनाडु में सामाजिक जागरूकता उत्तर भारत की तुलना में ज्यादा प्रभावी है। तमिलनाडु में जे जयललिता लंबे समय तक जनता की सिर आंखों पर रहीं। उन्हीं की पार्टी (AIADMK), बीजेपी की सहयोगी पार्टी है। अब बीजेपी यहां तर्क दे रही है कि परिसीमन के नाम पर झूठ फैलाकर एमके स्टालिन, राज्य की महिलाओं को राजनीतिक प्रभुत्व नहीं देना चाहते है। बीजेपी नेता यह तर्क दे रहे हैं कि क्षेत्रीय दलों ने केवल लोक-लुभावन वादों तक महिलाओं को सीमित रखा है, जब प्रतिनिधित्व देने की बारी आई तो इन लोगों ने कन्नी काट ली।
बीजेपी इन राज्यों के स्थानीय नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी पहले ही बढ़ा चुका है। अब संसद में मिली असफला को बीजेपी रणनीति बनाकर पेश कर रही है। अमित शाह ने पहले ही इशारा कर दिया है कि अब इस फैसले की वजह से वे बड़ी हार का सामना करने वाले हैं।
बीजेपी अब ममता बनर्जी, पिनराई विजयन और एमके स्टालिन जैसे नेताओं के 'महिला समर्थक' होने के दावे को कड़ी चुनौती दे सकती है। केरल में ईसाइयों और अन्य समुदायों के बीच 'सुरक्षा और सम्मान' के मुद्दे पर महिला मतदाताओं तक बीजेपी पहुंच रही है। बीजेपी का कहना है कि आरक्षण उनके सामाजिक प्रतिनिधित्व का इकलौता संवैधानिक रास्ता है, जिसे विपक्ष रोक रहा है।
कैसे महिलाओं को साध गई है बीजेपी?
भारतीय जनता पार्टी की राजनीति समझने वाले लोग कहते हैं कि महिलाएं बीजेपी की साइलेंट वोटर हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की कई योजनाएं महिला केंद्रित हैं। कई कल्याणकारी योजनाएं हैं ऐसी हैं, जिन्होंने सीधे तौर पर उनके जीवन स्तर में सुधार किया है। उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत अभियान, प्रधानमंत्री आवास योजना, जल जीवन मिशन जैसी पहलों ने महिलाओं को प्रभावित किया है।
कुछ राज्यों में 'लाडली बहन' स्कीम ने भी बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाया है। बीजेपी 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ'और 'लाडली बहना' जैसी वित्तीय सहायता योजनाओं को भी लागू करती है। तीन तलाक और महिला सुरक्षा को लेकर मुखर रहने का फायदा, चुनावी राज्यों में मिलता रहा है। महिलाएं आधा आबादी हैं, 21 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में बीजेपी की सरकार है। बीजेपी, अपने इसी वोट पर भरोसा कर रही है कि इस मुद्दे पर ये बातें, विपक्ष के खिलाफ जाने वाली हैं।
