पूर्वांचल में 50 पार की पीढ़ी से अगर यह सवाल किया जाए कि यूपी में ब्राह्मणों का सबसे बड़ा चेहरा कौन था है तो अक्सर उनकी जुबान के एक ही नाम आता है, 'हरिशंकर तिवारी।' एक जमाने में हत्या, अपहरण, अवैध कब्जा और ठेकों की लड़ाई के लिए बदनाम रहे पूर्वांचल के वह सबसे बड़े बाहुबली नेता थे। उनके नाम का खौफ ऐसा था कि श्रीप्रकाश शुक्ला जैसे कुख्यात गैंगस्टर भी उनके सामने मुंह खोलने की हिम्मत नहीं कर पाते थे। एक बार फिर उनका नाम सुर्खियों में है, उन पर सियासत हो रही है लेकिन अब उनके वारिस, अपनी राजनीतिक जड़ें जमाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
16 मई को उनकी पुण्यतिथि थी। बड़हलगंज के नेशनल इंटर कॉलेज में उनकी श्रद्धांजलि सभा भी हुई। अब श्रद्धांजलि सभा के 2 दिन बाद अचानक से सोशल मीडिया पर एक क्लिप वायरल होने लगी, जिसमें केशव प्रसाद मौर्य,हरिशंकर तिवारी पर पूछे गए एक सवाल से बचते नजर आ रहे हैं। पुरानी क्लिप में कुछ पत्रकार उनसे सवाल करते हैं कि गोरखपुर में हरिशंकर तिवारी की प्रतिमा लगने के लिए चबूतरा बन रहा था, उस पर रोक लगा दी।
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अचानक नाम क्यों चर्चा में है?
उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा था, 'वह गोरखपुर वाले जानें। हमारा मामला नहीं है।' अब लोग यह कह रहे हैं कि केशव प्रसाद मौर्य, ब्राह्मणों के लिए बोल नहीं सकते हैं क्योंकि उन पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नाराज हो सकते हैं। X पर तीन दिनों से लगातार पर हंगाम हो रहा है।
एके समाजवादी ने X पर लिखा है, 'यह मुख्यमंत्री से डर ही कहा जाएगा कि उनके मठ क्षेत्र में उपमुख्यमंत्री बोलने से बच रहे हैं। यह डर हो या क्षेत्रों का बंटवारा लेकिन इसकी सजा ब्राह्मणों को क्यों मिले? उनके सबसे बड़े नेता का चबूतरा रोकने का मतलब पूरे ब्राह्मण समाज का अपमान है। ब्राह्मण समाज के बड़े नेता हरिशंकर तिवारी जी से इस सरकार को ऐसी क्या नफरत है कि उनका चबूतरा रोक दिया गया। क्या गोरखपुर उत्तर प्रदेश का भाग नहीं है जिसमें आप बोलने से बच रहे हैं?'
ऐसे कई सोशल मीडिया हैंडल हैं, जिन्हें अब हरिशंकर तिवारी याद आ रहे हैं।
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क्यों बढ़ता गया हरिशंकर तिवारी का रुतबा?
1970 से 80 के दशक में गोरखपुर की स्थानीय राजनीति में गोरखनाथ मठ का दखल बढ़ता जा रहा था। यह दौर, यूपी में ठाकुरों के वर्चस्व का था। यह वही दौर था, जब महंत अवैद्यनाथ से नजदीकी रखने वाले कई क्षत्रिय नेताओं की राजनीति चमकी। ब्राह्मण बनाम ठाकुर का वहां टकराव बढ़ता गया और हरिशंकर तिवारी एक मजबूत ब्राह्मण नेता के रूप में उभरे।
स्थानीय सत्ता, ठेकेदारी, और क्षेत्रीय पकड़ को लेकर खूब झड़पें हुईं। हरिशंकर तिवारी पहले बाहुबली नेता के तौर पर कुख्यात रहे, एनकाउंटर की नौबत आई फिर अचानक से राजनीतिक एंट्री हुई और कद बढ़ता चला गया।
कल्याण सिंह की सरकार हो या मुलायम सिंह यादव की, उनकी सियासत चमकती रही। अलग-अलग सरकारों ने उन्हें अलग-अलग विभागों में अहम पद दिए। मंत्रिमंडल किसी का भी हो, वह मंत्री जरूर होते थे। हरिशंकर तिवारी की शह पर कई बड़े ब्राह्मण चेहरे निकले। अमरमणि त्रिपाठी और श्रीप्रकाश शुक्ला भी शुरुआती दिनों में इन्हीं से जुड़े रहे। बाद में वह खुद हरिशंकर तिवारी के लिए चुनौती बन गए थे।
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ब्राह्मणों ने अपना नेता क्यों मान लिया?
बालेंदु नाथ त्रिपाठी, हरिशंकर तिवारी, उनके निधन तक जुड़े रहे। वह बताते हैं, 'हरिशंकर तिवारी, नि:संदेह ब्राह्मणों के बड़े नेता रहे थे। उनके कद का नेता कोई दूसरा नहीं बन पाया। गोरखपुर ही नहीं, देवरिया, कुशीनगर, सिद्धार्थनगर, महाराजगंज, बस्ती, गोंडा, अयोध्या, बहराइच, श्रावस्ती और बलरामपुर तक उनकी लोकप्रियता एक जैसी रही है। लोग मुश्किलों में फंसते थे तो एक चेहरा याद आता था कि मंत्री जी सब संभाल लेंगे। कई बार वह दोनों पक्षों को बैठाकर मुद्दे सुलझा लेते थे। कोर्ट तक बात नहीं जाती थी।'
बालेंदु नाथ त्रिपाठी बताते हैं, 'एक जमाने तक, सरकार किसी की भी हो, धाक उन्हीं की रही। ब्राह्मण उन्हें अपनी अस्मिता का प्रतीक मानने लगे थे। वह जिस दल को समर्थन देते, उनके समर्थक, उन्हीं के साथ चल पड़ते। वह जनता दरबार लगाते थे, वहीं बैठे-बैठे नेताओं और अधिकारियों को फोन लगाते, जनता की शिकायतें सुनते। ऐसा कम होता था कि लोग हाता से निराश लौटें हो। 2007 के बाद हाता ने सिर्फ ढलान देखा। भीष्म शंकर तिवारी और विनय शंकर तिवारी राजनीति में तो हैं लेकिन अब योगी आदित्यनाथ के उभार और मठ के बढ़ते दखल में हाता, कहीं पीछे छूट गया है।'
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सियासी सफर कैसा था?
1980 के दशक तक, अपराधी से उनकी छवि नेता की हो गई थी। साल 1985 में चिलूपार से पहली बार विधायक बने। 1989 के विधानसभा चुनावों में भी उन्हें जीत मिली। 1991 में तीसरी बार वह विधायक बने। 1993, 06 और 2002 में भी उन्हें जीत मिली। 2007 का चुनाव वह हारे और हाशिए पर चले गए। उन्होंने शुरुआत निर्दलीय राजनीति से की थी, फिर 3 बार कांग्रेस में रहे, एक बार उन्होंने ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस (तिवारी) से भी जीत दर्ज की। साल 2002 में वह अखिल भारतीय लोकतांत्रिक कांग्रेस से चुनाव लड़े।
पहली बार उन्हें कल्याण सिंह की सरकार में साल 1998 में मंत्री बनने का मौका मिला। सीधे विज्ञान और तकनीती विभाग मिल गया। नवंबर 1999 में से अक्तूबर तक, वह स्टांप रजिस्ट्रेशन मंत्री रहे। मायावती और मुलायम सिंह यादव की सरकार में भी 2003 से 2007 के बीच उन्होंने मंत्री पद संभाला। 2007 के बाद उनका राजनीतिक ग्राफ गिरता चला गया।
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पूर्वांचल में ब्राह्मण बाहुल सीटें कौन सी हैं, कितना दबदबा?
अब हरिशंकर तिवारी की विरासत विनय शंकर तिवारी और भीष्म शंकर तिवारी संभाल रहे हैं। वह बहुजन समाज पार्टी से भी जुड़े रहे और सांसद भी बने। अभी उनके पास कोई पद नहीं है। कुछ ऐसा ही हाल विनय शंकर तिवारी का भी है। वह भी पहले बहुजन समाज पार्टी में रहे, फिर समाजवादी पार्टी में आए। सांसद रह चुके हैं लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में जगदंबिका पास से डुमरियांगज संसदीय क्षेत्र में हार गए। अब विधानसभा चुनावों में भी वह अपनी भूमका तलाश रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण के असर वाली 100 से ज्यादा सीटें हैं। आधिकारिक आंकड़ा नहीं है लेकिन अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ब्राह्मण आबादी करीब 10 से 12 फीसदी है। पूर्वांचल में भी ब्राह्मण 50 से 60 सीटों पर जीत हार तय करने की स्थिति में कहे जाते हैं। हरिशंकर तिवारी फैक्टर, अब भले ही इतना बड़ा न हो लेकिन ब्राह्मण नेताओं की नाराजगी और असंतोष की वजह से हरिशंकर तिवारी के परिवार का रुख, काफी कुछ बदल सकता है।
