आपने हेल्थ इन्श्योरेन्स ले रखा है प्रीमियम भी हर साल भर रहे हैं लेकिन जब बीमार पड़े और क्लेम किया, तो इन्श्योरेन्स कंपनी ने मना कर दिया। कहा 'वेटिंग पीरियड पूरा नहीं हुआ।' यह सुनने में अजीब लगता है लेकिन यह हर पॉलिसी में होता है। अगर आपको इसके बारे में पहले से पता नहीं है तो जरूरत के वक्त पैसे नहीं मिलेंगे चाहे पॉलिसी कितनी भी महंगी हो। अगर कोई व्यक्ति पहले से जानता है कि अगले महीने उसका ऑपरेशन होने वाला है। तो वह सोचता है 'पहले इन्श्योरेन्स ले लेता हूं, फिर ऑपरेशन का पैसा इन्श्योरेन्स से ले लूंगा।' 

 

अगर इन्श्योरेन्स कंपनी यह होने दे, तो हर कोई यही करेगा पहले बीमार पड़ो, फिर इन्श्योरेन्स लो, फिर क्लेम करो। इससे इन्श्योरेन्स कंपनी को हर बार नुकसान होगा क्योंकि एक महीने का प्रीमियम भरा और क्लेम लाखों का मांग लिया। 

दरअसल इन्श्योरेन्स तब सही तरीके से काम करता है जब हजारों लोग प्रीमियम भरते हैं कुछ बीमार पड़ते हैं, कुछ नहीं पड़ते। जो लोग स्वस्थ हैं उनका पैसा उन लोगों के काम आता है जो बीमार पड़ गए लेकिन अगर सिर्फ वही लोग इन्श्योरेन्स लें जो पहले से बीमार हैं, तो यह पूरा सिस्टम बिगड़ जाएगा और इन्श्योरेन्स कंपनी को प्रीमियम इतना बढ़ाना पड़ेगा कि वह सबके लिए बहुत महंगा हो जाएगा। इसीलिए वेटिंग पीरियड रखा जाता है ताकि लोग जरूरत पड़ने पर नहीं बल्कि पहले से इन्श्योरेन्स लें।

 

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कितने तरह के वेटिंग पीरियड होते हैं?

वेटिंग पीरियड चार तरह के होते हैं इनिशियल वेटिंग पीरियड, प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज वेटिंग पीरियड, स्पेसिफिक डिजीज़ वेटिंग पीरियड और मैटर्निटी वेटिंग पीरियड।

1. इनिशियल वेटिंग पीरियड

लगभग सभी हेल्थ इन्श्योरेन्स प्लान्स में 30 दिनों का इनिशियल वेटिंग पीरियड होता है। इस दौरान एक्सीडेंट को छोड़कर किसी भी बीमारी के लिए क्लेम नहीं होता। यानी पॉलिसी लेने के तुरंत बाद अगर बुखार आया या अस्पताल जाना पड़ा, तो इन्श्योरेन्स कंपनी पैसे नहीं देगी। 

2. प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज वेटिंग पीरियड 

यह सबसे बड़ी समस्या है जिसके बारे में ज्यादातर लोगों को पता नहीं होता। अगर आपको पॉलिसी लेने से पहले से कोई बीमारी है  जैसे डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, या हार्ट की समस्या तो उसके लिए अधिकतम 36 महीने यानी 3 साल तक क्लेम नहीं होगा। आईआरडीएआई (Insurance Regulatory and Development Authority of India) ने अप्रैल 1, 2024 से एक नया नियम लागू किया जिसमें प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज के लिए वेटिंग पीरियड को 4 साल से घटाकर 3 साल कर दिया गया। पहले 4 साल इंतजार करना पड़ता था अब 3 साल करना पड़ता है। 

3. स्पेसिफिक डिजीज वेटिंग पीरियड

कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं जो पहले से नहीं थीं लेकिन फिर भी उन पर अलग से वेटिंग पीरियड लगता है। हर्निया, कैटरेक्ट और जॉइंट रिप्लेसमेंट जैसी बीमारियों के लिए 2 साल तक का वेटिंग पीरियड हो सकता है। इसका मतलब यह है कि पॉलिसी लेने के 2 साल बाद ही इन बीमारियों पर क्लेम मिलेगा, उससे पहले नहीं।

4. मैटर्निटी वेटिंग पीरियड

इंडिया में कोई भी मैटर्निटी इन्श्योरेन्स प्लान बिना वेटिंग पीरियड के नहीं मिलता। सभी मैटर्निटी कवरेज प्लान्स में 3 महीने से 6 साल तक का वेटिंग पीरियड होता है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आप प्रेग्नेंसी के करीब इन्श्योरेन्स लेते हैं तो डिलीवरी का खर्च इन्श्योरेन्स नहीं देगी।

 

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5. क्रिटिकल इलनेस वेटिंग पीरियड 

कैंसर और स्ट्रोक जैसी जानलेवा बीमारियों के लिए 90 दिन से 6 महीने तक का वेटिंग पीरियड होता है और इस समय के बाद ही क्लेम स्वीकार किया जाता है। यानी अगर पॉलिसी लेने के 2 महीने बाद किसी को कैंसर डायग्नोज हुआ तो इन्श्योरेन्स कंपनी उस क्लेम को रिजेक्ट कर देगी। इसीलिए क्रिटिकल इलनेस इन्श्योरेन्स हमेशा तब लेनी चाहिए जब आप पूरी तरह स्वस्थ हों।

 

वेटिंग पीरियड कम करने के तरीके क्या हैं?

वेटिंग पीरियड कम करने के लिए तीन तरीके हैं ऐसी पॉलिसी लेना जिसमें कम वेटिंग पीरियड हो, ऐड-ऑन राइडर लेना जो वेटिंग पीरियड घटाए या जल्दी पॉलिसी खरीद लेना ताकि जरूरत से पहले ही वेटिंग पीरियड खत्म हो जाए।  

इसके अलावा क्लेम के समय भी अब नए नियम लागू हैं। आईआरडीएआई के नए नियमों के मुताबिक कैशलेस क्लेम ऑथोराइजेशन 1 घंटे के अंदर देना होगा और हॉस्पिटल डिस्चार्ज के लिए अप्रूवल 3 घंटे के अंदर मिलनी चाहिए। किसी भी हालत में पॉलिसीहोल्डर को हॉस्पिटल में डिस्चार्ज के लिए इंतजार नहीं करवाया जा सकता।